हाल के समय में पश्चिमी देशों के द्वारा संरक्षणवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। संरक्षणवाद से तात्पर्य व्यापारिक, आर्थिक एवं नियुक्तियों आदि के मामले में अन्य देशों की कम्पनियों एवं नागरिकों की तुलना में अपने देश की कम्पनियों एवं नागरिकों को प्राथमिकता देने से है।
इस संरक्षणवाद ने भारतीय सूचना-प्रौद्योगिकी उद्योग को काफी गंभीरता से प्रभावित किया है। ज्ञातव्य है कि भारतीय सूचना-प्रौद्योगिकी कम्पनियाँ अपनी विशिष्ट क्षमता के कारण दुनिया भर में अपना नाम स्थापित कर रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा घोषित अमेरिका फर्स्ट नीति इसी संरक्षण का नमूना है।
संरक्षणवाद ने भारतीय सूचना-प्रौद्योगिकी कम्पनियों के विरूद्ध किस प्रकार की चुनौती उत्पन्न की है?
- अमेरिका के द्वारा एच 1 बी वीजा सम्बंधी नियमों को काफी सख्त बनाने का प्रयास किया जा रहा है जिससे भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी प्रोफेशनल के लिए अमेरिका में काम करना कठिन हो जायेगा।
- अमेरिकी सरकार के द्वारा बाय अमेरिकन एण्ड हायर अमेरिकन (Buy American Hire American) की नीति अपनायी जा रही है जिससे भारतीय सूचना-प्रौद्योगिकी कम्पनियों के लिए अमेरिका में काम की संभावना काफी कम हो गयी है।
- टीसीएस, विप्रो एवं इन्फोसिस जैसी कम्पनियों के लिए यह जरूरी कर दिया गया है कि यदि उन्हें पश्चिमी देशों में कार्य करना है तो उन्हें भारतीयों के स्थान पर स्थानीय नागरिकों को नियुक्त करना होगा।
- स्थानीय नागरिकों की नियुक्ति को शर्त से एक तो भारतीयों को नौकरी से हटाना पड़ रहा है वहीं दूसरी ओर चूँकि स्थानीय नागरिकों को भारी मात्रा में वेतन देना पड़ रहा है अतः उनके मुनाफे में कमी आ रही है।
- इसी के साथ आर्टिफिसिएल इंटेलीजेन्स, क्लाउड कम्प्यूटिंग तथा बिग डाटा एवं ब्लॉकचेन जैसी अत्याधुनिक तकनीकों ने भी भारतीय सूचना-प्रौद्योगिकी कम्पनियों के समक्ष संकट उत्पन्न किया है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारतीय सूचना-प्रौद्योगिकी कम्पनियों को किस प्रकार के कदम उठाने चाहिए?
- भारत को संरक्षणवाद के विरूद्ध वैश्विक मंचों से आवाज उठानी चाहिए जैसा कि हाल ही में दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक फोरम की बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री ने किया।
- भारत को विकासशील देशों को साथ में लेकर विश्व व्यापार संगठन जैसे मंच पर इस मुद्दे को गंभीरता से उठाना चाहिए।
- अफ्रीका, मध्य एशिया, दक्षिण पूर्वी एशिया जैसे नये बाजारों में भारतीय कम्पनियों को अवसर तलाश करने चाहिए।
- ब्लॉकचेन, बिगडाटा, अर्टिफिसिएल इंटेलीजेंस जैसी नवीन तकनीकों में भारतीय सूचना-प्रौद्योगिकी कम्पनियों को महारत हासिल करनी चाहिए। इससे विकसित देश स्वयं उनकी सेवायें प्राप्त करेंगे।
निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पश्चिमी देशों के संरक्षणवाद तथा नवीन तकनीकी प्रगति ने भारतीय सूचना-प्रौद्योगिकी कम्पनियों के लिए नयी चुनौती उत्पन्न की है। उपर्युक्त उल्लिखित उपायों पर कार्य करके इन चुनौतियों का काफी हद तक समाधान किया जा सकता है।