VI. अधिकरण तत्पुरुष (सप्तमी तत्पुरुष) समास - इसमें अधिकरण कारक की विभक्ति ‘में, पर’ लुप्त हो जाती है; जैसे-
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विग्रह
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समस्त पद
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शोक में मग्न
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शोकमग्न
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लोक में प्रिय
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लोकप्रिय
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पुरुषों में उत्तम
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पुरुषोत्तम
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धर्म में वीर
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धर्मवीर
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आप पर बीती
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आपबीती
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कला में श्रेष्ठ
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कलाश्रेष्ठ
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गृह में प्रवेश
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गृहप्रवेश
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आनन्द में मग्न
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आनन्दमग्न
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दही में डूबा बड़ा
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दहीबड़ा
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नोट : तत्पुरुष समास के उपर्युक्त भेदों के अलावे कुछ अन्य भेद भी हैं, जिनमें प्रमुख है नञ् समास।
नञ् समास : जिस समय के पूर्व पद में निषेधसूचक/नकारात्मक शब्द (अ, अन्, न, ना, गैर आदि) लगे हो; जैसे- अधर्म (न धर्म), अनिष्ठ (न इष्ट), अनावश्यक (न आवश्यक), नापसंद (न पसंद), गैर वाजिब (न वाजिब) आदि।
3. कर्मधारय समास - जिस समस्त पद का उत्तरपद प्रधान हो तथा पूर्वपद व उत्तरपद में उपमान-उपमेय अथवा विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध हो, कर्मधारय समास कहलाता है।
पहचान- विग्रह करने पद दोनों पद के मध्य में ‘हैं जो’, ‘के समान’ आदि आते है।
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विग्रह
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समस्त पद
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कमल के समान चरण
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चरणकमल
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कनक की-सी लता
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कनकलता
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कमल के समान नयन
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कमलनयन
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प्राणों के समान प्रिय
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प्राणप्रिय
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चन्द्र के समान मुख
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चन्द्रमुख
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मृग के समान नयन
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मृगनयन
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देह रूपी लता
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देहलता
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क्रोध रूपी अग्नि
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क्रोधाग्नि
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लाल है जो मणि
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लालमणि
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नीला है जो कंठ
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नीलकंठ
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महान है जो पुरूष
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महापुरूष
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महान है जो देव
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महादेव
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आधा है जो मरा
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अधमरा
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परम है जो आनन्द
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परमानन्द
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महान आत्मा
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महात्मा
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नीला कमल
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नीलकमल
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महान कवि
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महाकवि
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