समास-5

VI.          अधिकरण तत्पुरुष (सप्तमी तत्पुरुष) समास - इसमें अधिकरण कारक की विभक्ति ‘में, पर’ लुप्त हो जाती है; जैसे-

विग्रह

समस्त पद

शोक में मग्न

शोकमग्न

लोक में प्रिय

लोकप्रिय

पुरुषों में उत्तम

पुरुषोत्तम

धर्म में वीर

धर्मवीर

आप पर बीती

आपबीती

कला में श्रेष्ठ

कलाश्रेष्ठ

गृह में प्रवेश

गृहप्रवेश

आनन्द में मग्न

आनन्दमग्न

दही में डूबा बड़ा

दहीबड़ा

नोट : तत्पुरुष समास के उपर्युक्त भेदों के अलावे कुछ अन्य भेद भी हैं, जिनमें प्रमुख है नञ् समास।

नञ् समास : जिस समय के पूर्व पद में निषेधसूचक/नकारात्मक शब्द (अ, अन्, न, ना, गैर आदि) लगे हो; जैसे- अधर्म (न धर्म), अनिष्ठ (न इष्ट), अनावश्यक (न आवश्यक), नापसंद (न पसंद), गैर वाजिब (न वाजिब) आदि।

3.            कर्मधारय समास - जिस समस्त पद का उत्तरपद प्रधान हो तथा पूर्वपद व उत्तरपद में उपमान-उपमेय अथवा विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध हो, कर्मधारय समास कहलाता है।

               पहचान- विग्रह करने पद दोनों पद के मध्य में ‘हैं जो’, ‘के समान’ आदि आते है।

विग्रह

समस्त पद

कमल के समान चरण

चरणकमल

कनक की-सी लता

कनकलता

कमल के समान नयन

कमलनयन

प्राणों के समान प्रिय

प्राणप्रिय

चन्द्र के समान मुख

चन्द्रमुख

मृग के समान नयन

मृगनयन

देह रूपी लता

देहलता

क्रोध रूपी अग्नि

क्रोधाग्नि

लाल है जो मणि

लालमणि

नीला है जो कंठ

नीलकंठ

महान है जो पुरूष

महापुरूष

महान है जो देव

महादेव

आधा है जो मरा

अधमरा

परम है जो आनन्द

परमानन्द

महान आत्मा

महात्मा

नीला कमल

नीलकमल

महान कवि

महाकवि

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