संयुक्त राष्ट्र संघ की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार यदि इसी गति से कार्बन उत्सर्जन किया जाता रहा तो 21वीं सदी के अंत तक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने के पेरिस समझौते के लक्ष्य को पाना कठिन होगा स्पष्ट कीजिए। इस सम्बंध में भारत दुनिया के समक्ष किस प्रकार एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है?

वर्ष 2015 में आयोजित पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के तहत भागीदार देशों के बीच यह सहमति बनी थी कि 21वीं सदी में वैश्विक तापमान को 1990 के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए सभी देशों को मिलकर प्रयास करने होंगे। किंतु संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट से ज्ञात हुआ है कि जिस गति से कार्बन उत्सर्जन जारी है उससे उपर्युक्त लक्ष्य को प्राप्त करने में कठिनाई होगी।

यही कारण है कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह कहा जा रहा है दुनिया के देशों को मिलकर एक नया लक्ष्य तय करना होगा। ज्ञातव्य है कि अमेरिका जैसे देश पेरिस जलवायु समझौते से  बाहर आ रहे हैं  तथा पेरिस जलवायु समझौते के तहत तय प्रतिबद्धता को मानने से इन्कार कर रहे हैं।

ऐसी स्थिति में भारत दुनिया के समक्ष जलवायु परिवर्तन के सम्बंध में नेतृत्व संभाल सकता है। भारत ने जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के सम्बंध में जिस प्रकार की प्रतिबद्धता दिखायी है उससे साबित होता है कि भारत जलवायु परिवर्तन की समस्या के प्रति गंभीर है तथा पूरी तन्मयता से लक्ष्य की ओर अग्रसर है।

जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के सम्बंध में भारत निम्न कदम उठाकर दुनिया के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत कर समता हैः

  • भारत दुनिया के कार्बन उत्सर्जन में कुल 7 प्रतिशत की भूमिका अदा करता है तथा दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जनकर्ता देश है। इस कारण से जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में भारत की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
  • सौरऊर्जा, पवनऊर्जा एवं अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों को बढ़ावा देकर देश की अधिकांश ऊर्जा जरूरत को पूरा करना होगा।
  • ज्ञातव्य है कि भारत के द्वारा आईएनडीसी (INDC) लक्ष्य घोषित किया गया है जिसके तहत भारत अपनी समस्त ऊर्जा जरूरतों का तकरीबन 35 प्रतिशत हिस्सा वर्ष 2030 तक नवीनकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों से प्राप्त करेगा।
  • परिवहन के क्षेत्र में वर्ष 2020 तक भारत स्टेज टप् को अपनाकर तथा वर्ष 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाकर कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती की जा सकती है।
  • जैविक कृषि को बढ़ावा देकर उर्वरकों की खपत को  निम्नतम स्तर पर लाना तथा सतत् कृषि को बढ़ावा देना।
  • कचरा प्रबंधन की वैज्ञानिक प्रणाली को अपनाकर, सामाजिक जागरूकता लाकर एवं सामूहिक वृक्षारोंपण     को बढ़ावा देकर कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सकता है।
  • सबसे बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एवं तकनीकी  आदान-प्रदान से इस सम्बंध में उल्लेखनीय प्रगति की जा सकती है। अंतर्राष्ट्रीय सोलर एलायंस इस  सम्बंध में महत्वपूर्ण है।
  • निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यदि वर्तमान गति से कार्बन उत्सर्जन होता रहा तो जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करना कठिन होगा। यही कारण है कि इस सम्बंध में नवीन लक्ष्य तय करने होंगे। दुनिया के देशों के समक्ष भारत इस सम्बंध में अपना उदाहरण प्रस्तुत कर नेतृत्वकर्ता की भूमिका अदा कर सकता है।
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