समभाव एवं स्थिरचित्तता से तात्पर्य ऐसी मनौवैज्ञानिक स्थिति से है जब मनुष्य स्थिर एवं शांत रहता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति बहुत ही तार्किक व्यवहार करता है तथा बाहरी भावनायें एवं कष्ट उस पर प्रभाव नहीं डाल पाते है।
श्रीमद्भागवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि वह समभाव एवं स्थिरचित्तता से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। इस गुण को भगवान बुद्ध में भी देखा जाता है। इसी गुण के कारण वेे अपने विरोधियों को भी प्रशंसक बना लेते थे।
सार्वजनिक प्रशासन में समभाव एवं स्थिरचित्तता का महत्व :
- सार्वजनिक प्रशासन में दैनिक रूप से कई ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जहाँ शांत एवं स्थिर होकर निर्णय लेना होता है। यदि मानसिक संतुलन में थोड़ी भी अस्थिरता आयी तो समस्या गंभीर रूप धारण कर सकती है।
- उदाहरण के तौर पर साम्प्रदायिक हिंसा एवं दंगों की स्थिति में बहुत ही स्पष्टता के साथ निर्णय लेना पड़ता है अन्यथा स्थिति बिगड़ सकती है।
- समभाव एवं स्थिरचित्तता (Equanimity ) के बल पर प्रशासक व्यवहारिक एप्रोच को अपनाता है जिससे प्रशासन को समुचित ढंग से संचालित करने में मदद मिलती है।
- इन गुणों से युक्त प्रशासक एक बेहतर प्रबंधक भी होता है जो कर्मचारियों के साथ-साथ संबंधित क्षेत्र की जनता को भी प्रभावित करता है।
- समभाव का गुण प्रशासन में पक्षपातपूर्ण व्यवहार को समाप्त करता है तथा पारदर्शिता एवं कुशलता लाने का कार्य करता है।
- समभाव एवं स्थिरचित्तता व्यक्ति को आत्म अनुभूति के योग्य बनाता है। ऐसा प्रशासक प्रशासन में समानुभूति, संवेदनशीलता आदि को बेहतर तरीके से लागू करता है और वंचित तबकों को लाभांवित करता है।
- यदि संसद में इन गुणों से युक्त संसार एवं विधानसभाओं में विधायक पहुंचते हैं तो वो प्रगतिशील कानूनों का मार्ग प्रशस्त करते हैं जिससे समाज एवं देश प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होते हैं।
- सबसे बढ़कर इससे सरकार को अन्य एजेंसियों मसलन सिविल सोसाइटी को अपने साथ जोड़ने में मदद मिलती है जिससे सरकार पर लोगों का विश्वास दृढ़ होता है।
निष्कर्ष : निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि समभाव एवं स्थिरचित्तता सुदृढ़ मानसिक स्थिति के परिचायक हैं। इन गुणों से युक्त प्रशासक सार्वजनिक प्रशासन में उल्लेखनीय भूमिका अदा कर एक मिसाल कायम करते हैं।