इस मुद्दे में कई कानूनी एवं नैतिक पहलू शामिल हैं जिन्हें निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-
1. प्रथम मुद्दा ऐतिहासिक घटनाओं की सही अथवा गलत प्रस्तुति का है।
2. दूसरा मुद्दा लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र का है।
3. तीसरा मुद्दा कानूनी है क्योंकि केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड तथा सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति के बाद भी फिल्म के प्रदर्शन के विरूद्ध विरोध व्यक्त करना गलत है।
ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इसके लिए निम्न कदमों को उठाये जाने की जरूरत है-
- जागरूकता लाये जाने की आवश्यकता है ताकि कोई भी फिल्म निर्माता या निर्देशक ऐतिहासिक घटनाओं के साथ छेड़छाड़ न कर सके। ज्ञातव्य है कि हाल के समय में कई ऐसी फिल्में आयी हैं जिनका निर्माण धन अर्जित करना ही होता है। ये तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करके बनायी जाती हैं ताकि दर्शकों का मनोरंजन हो सके।
- देश मे फिल्मों का सार्वजनिक प्रदर्शन केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की अनुमति के बाद होता है। इसलिए केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को राजनीति से अलग करके उसे निष्पक्ष एवं पूर्ण स्वायत्त निकाय बनाना चाहिए। ज्ञातव्य है कि फिलहाल केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रलय के अधीन है।
- युवाओं की जिस भीड़ के द्वारा फिल्म के प्रदर्शन के विरोद्ध का आयोजन किया जा रहा था वे किसी खास राजनीतिक दल की विचारधारा से प्रेरित लग रहे थे। ऐसे युवाओं को शिक्षा, कौशल एवं रोजगार प्रदान कर रचनात्मकता की ओर मोड़ना होगा।
- आम जनता को इस सम्बंध में जागरूक करना होगा कि वह अफवाहों पर ध्यान न दे। ज्ञातव्य है कि कई लोग सिर्फ इसलिए विरोध में शामिल थे क्योंकि अन्य लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे होते हैं। ऐसी स्थिति से बचना होगा।
- इस सम्बंध में हमें न्यायालय की गरिमा का भी ध्यान रखना होगा। ज्ञातव्य है कि न्यायालय के आदेश के बाद भी लोग फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने की माँग पर अड़े हुए हैं।
उपर्युक्त उल्लिखित सुझावों पर समुचित ढंग से अमल करके ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति करे नियंत्रित किया जा सकता है।