समान लिंग के प्रति आकर्षण रखने वाले स्त्री अथवा पुरूष को समलैंगिक एवं इस गुण को समलैंगिकता माना जाता है। दूसरे शब्दों में जब कोई पुरूष किसी अन्य पुरूष या कोई स्त्री किसी अन्य स्त्री के प्रति आकर्षण का भाव रखे तो इन्हें समलैंगिक माना जाता है।
भारत में सर्वप्रथम ब्रिटिश काल में वर्ष 1861 में कानून का निर्माण किया गया तथा धारा 377 को भारतीय दण्ड संहिता में शामिल किया गया। धरा 377 का संबंध समलैंगिकता से था।
धारा 377 के तहत समलैंगिकता को अपराध माना गया है तथा इसके लिए आजीवन कारावास या 10 वर्ष के कारावास तथा जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
धरा 377 में प्रकृति के विरुद्ध यौन संबंध को अपराध माना गया है। यहाँ कौन-सा संबंध प्रकृति के विरुद्ध है और कौन सा प्रकृति के अनुकूल यह तो नहीं बताया गया है किंतु शब्दावली से स्पष्ट है कि जब कोई पुरूष किसी दूसरे पुरूष से यौन संबंध बनाता है या कोई महिला किसी अन्य महिला से यौन संबंध बनाती है तो ऐसे संबंध प्रकृति के विरुद्ध यौनाचार माने जायेंगे। इसका कारण संभवतः यह है कि प्रकृति सिर्फ एक पुरूष को महिला के साथ और महिला को पुरूष के साथ ही संबंध बनाने की अनुमति प्रदान करती है।
ऐसी स्थिति में समलैंगिकों के अधिकारों को पूर्णतः अनदेखी हो जाती है। समलैंगिक अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं। उनका मानना है कि यदि आपसी सहमति से दो वयस्कों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित होते हैं तो इसे अनैतिक नहीं माना जा सकता है। साथ ही इसे कानून के विरुद्ध भी नहीं माना जा सकता है क्योंकि कानून सार्वजनिक जीवन को विनियमित करता है न कि व्यक्तिगत जीवन को।
लोग अपने घर के भीतर या एकांत जो भी करते हैं वह उनका मूलभूत अधिकार है। इस अधिकार से उन्हें वंचित नहीं किया जाना चाहिए। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा भी निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है।
जब बात समलैंगिकता की आती है तो प्रश्न उठता है कि क्या समलैंगिक संबंधों को निजता के दायरे से बाहर रखना उचित होगा। इस संबंध में वर्ष 2009 एक विभाजक वर्ष के रूप में सामने आता है।
वर्ष 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक लोगों की समस्याओं को गहराई से समझने का प्रयास किया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने दो वयस्कों के बीच सहमति से एकांत में बनाये गये संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। इस फैसले ने समलैंगिक लोगों के लिए एक आशा की किरण उत्पन्न की थी।
किंतु 4 वर्षों के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2013 में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया तथा समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखने वाली धरा 377 को वैधानिक ठहराया।
यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से समलैंगिक लोगों को आघात पहुंचा किंतु उन्होंने अपनी लड़ाई जारी रखी। इस लड़ाई के कारण ही सर्वोच्च न्यायालय ने 8 जनवरी 2018 को इस मामले पर पुनः सुनवाई करने का निर्णय लिया है। वस्तुतः सर्वोच्च न्यायालय अपने पिछले फैसले (सुरेश कुमार कौशल मामला) पर पुनर्विचार के लिए याचिका को स्वीकार कर लिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पिछले फैसले सुरेश कुमार कौशल मामले में समलैंगिक संबंधों को अपराध घोषित किया था तथा दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को बदल दिया था। इस बार सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में न सिर्फ पुनर्विचार का निर्णय लिया है बल्कि मामले की सुनवाई संविधान पीठ से कराने का भी निर्णय दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह याचिका पांच उन लोगों के द्वारा दाखिल की गयी है जो सीधे तौर पर इस फैसले से प्रभावित हो रहे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय इस याचिका को स्वीकार कर निम्नलिखित बाते कहीं जिससे पता लगाया जा सकता है कि स्वयं सर्वोच्च न्यायालय भी समलैंगिकता के संबंध में अपनी राय परिवर्तित कर रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धरा 377 की परिभाषा में प्रयुक्त शब्दों में प्रकृति के विरुद्ध यौनाचार की बात कही गयी है। किंतु प्रकृति की अनुकूलता के बारे में हमेशा एक समान अवधारणा नहीं रहती है। इसी प्रकार सामाजिक नैतिकता भी समय के अनुसार बदलती रहती है। चूंकि कानून जीवन के साथ सामंजस्य रखते हैं इसलिए इनमें बदलाव होता रहता है। उल्लेखनीय है कि जिस ब्रिटेन ने 1861 में भारतीय दण्ड संहिता में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा था उसी ब्रिटेन ने वर्ष 1967 में समलैंगिकता को अपने यहां अपराध मानने से इंकार कर दिया। इस संबंध में ब्रिटेन में कानून भी बनाया जा चुका है।
ज्ञातव्य है कि सामाजिक स्वीकृत मूल्यों एवं मापदण्डों का पालन ही नैतिकता है। किंतु प्रत्येक समाज के मूल्य एवं मापदण्ड अलग-अलग होते हैं। भारतीय समाज के मूल्य एवं मापदण्ड पश्चिमी देशों के मूल्यों एवं मापदण्डों से भिन्न है।
जिस समलैंगिकता को भारत में अवैधानिक एवं अपराध माना जाता है उसी समलैंगिकता को दुनिया के 22 देशों ने मान्यता प्रदान कर दी है। इन 22 देशों में कनाडा, अर्जेण्टीना, ब्राजील, फ्रांस, डेनमार्क, दक्षिण अफ्रिका एवं संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश शामिल हैं जिन्होंने समान लिंगी विवाह को मान्यता प्रदान कर दी है।
अंततः निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि समलैंगिकता को अपराध ठहराया जाना गलत है। इसे मान्यता दी जानी चाहिए क्योंकि यह मनुष्य के जीवन में होने वाले जीव संबंधी परिवर्तनों से संबंधित है। इन लोगों के अधिकारों का भी ध्यान रखना होगा। जब दो वयस्क आपसी सहमति से यौन संबंध स्थापित करते हैं तो इसे अपराध की श्रेणी से बाहर रखना ही उचित होगा क्योंकि यह उनके निजता के अधिकार के साथ-साथ चयन एवं स्वतंत्रता के अधिकार से भी संबंधित है। हाँ समलैंगिकता को विनियमित किये जाने की आवश्यकता है ताकि सार्वजनिक तौर पर इसका प्रदर्शन न हो सके।