विविधता में एकता : भारतीय संस्कृति का मूल

प्रो. हुमायूँ कबीर ने कहा था, कि “भारतीय संस्कृति की कहानी एकता, समाधानों का समन्वय तथा प्राचीन परंपराओं के पूर्ण संयोग के उन्नति की कहानी है। यह प्राचीन काल में रही है और जब तक यह विश्व रहेगा तब तक यह भी सदैव रहेगी। दूसरी संस्कृतियां नष्ट हो गयीं परंतु भारतीय संस्कृति एवं इसकी एकता अमर है।

            भारत एक विशाल देश है। यहाँ की भू-प्रकृति, जलवायु तथा वनस्पति आदि में तो भिन्नता है ही साथ ही यहाँ के लागों के खान-पान, वेशभूषा, धर्मं, भाषा एवं रीति-रिवाजों में भी अंतर है।

            भौगोलिक रूप से देखा जाये तो भारत में उत्तर की ओर जहां गगनचुम्बी पर्वत हैं वहीं दक्षिण में गहरी खाइयाँ एवं पठारी भूमि है। कहीं नदियों का जाल बिछा है तो कहीं विशाल मरूस्थल मौजूद है।

            भौगोलिक विभिन्नता की तरह ही यहां के नृवंश में भी भिन्नता पायी जाती है। भारत में निग्रोटो, नॉर्डिक, प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड आदि मानव वर्ग लोग रहते हैं। मानव वर्ग की इन विभिन्नताओं को देखते हुए इतिहासकार बिण्सेंट स्मिथ ने भारत को नृतांत्रिक संग्रहालय कहा है।

            इसी प्रकार भारत में राजनीतिक, सांस्कृतिक, भाषायी एवं धार्मिक विविधता भी मौजूद है। भारत अपनी प्राकृतिक सीमाओं के कारण कभी भी राजनीतिक एकता के सूत्र में नहीं बंध पाया है। प्राचीनकाल से लेकर आज तक भारत अनेक राज्यों में बंटा हुआ है।

            भारत की भाषायी एवं धर्मिक विविधता भी अनोखी है। भारत में तकरीबन 225 भाषायें बोली जाती हैं। जबकि बोलियों एवं उपबोलियों की संख्या काफी अधिक है।

भाषायी विभिन्नता के समान धर्मिक विभिन्नता भी मौजूद है। ज्ञातव्य है कि भारत में हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, मुस्लिम, सिक्ख तथा ईसाई धर्मानुयायी निवास करते हैं। इन सभी के धर्मिक व्यवहारों में भारी अंतर पाया जाता है। इसी प्रकार देश की सांस्कृतिक विभिन्नता भी कम अनोखी नहीं है। भारत में अनेक जातियों के आचार-विमर्श, खान-पान, वेशभूषा तथा त्यौहारों आदि में भारी भिन्नता दिखायी देती है।

            किंतु उपर्युक्त विभिन्नताओं तथा विविधता के बावजूद प्रत्येक क्षेत्र में एक मौलिक एकता भी दिखायी देती है जिसे हम निम्न तथ्यों के आधार पर समझ सकते हैं।

            भौगोलिक एकता की बात करें तो उत्तर में हिमालय तथा अन्य तीन दिशाओं से समुद्र से घिरा हुआ दुनिया में एक ही देश है जिसे हम भारतवर्ष के नाम से जानते हैं।

उत्तर यत् समुदाय हिमादेश्चैव दक्षिणम्।

वर्ष तद् भारतं नाम, भारती यत्र संतार्तः।।

            अर्थात् पृथ्वी का वह भू-भाग जो समुद्र के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में स्थित है और जहां भारतीय सन्तति का वास है, वह भारतवर्ष है।

            इसी प्रकार प्राचीनकाल से ही भारत को सात नदियों, सात नगरों तथा सात पर्वतों का देश कहा गया है। वर्तमान में जब कोई भारतीय स्नान करता है तो निम्न सात नदियों का नाम जरूर लेता है।

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिंधु कावेरी जलेडमिस्मन् सन्निधिं कुरु।।

अर्थात् हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी हमारे इस जल में वास करो।

            इस प्रकार विविधता में एकता भारतीय संस्कृति का मूल रहा है। यद्यपि प्राचीनकाल से ही देश अनेक राजनीतिक इकाइयों में बंट रहा है किंतु यह भी सत्य है कि देश में राजनीतिक एकता प्राचीन काल से ही विद्यमान रही है। उदाहरण के तौर पर प्राचीनकाल से ही भारतीय राजाओं की मनोकामना चक्रवर्ती सम्राट बनने की रही है। इन राजाओं ने एकराट, पृथ्वीपति, सार्वभौम जैसी उपाधियां धारण की तथा अवश्मेघ, वाजपेय एवं राजसूय यज्ञों का आयोजन किया।

            राजनीतिक एकता के समान देश में धर्मिक, भाषायी एवं सांस्कृतिक एकता भी मौजूद है। उदाहरण के तौर पर भारत में कई धर्मों के लोग निवास करते हैं किंतु वे सभी आपस में समन्वयपूर्वक रहते हैं। बहुलतावाद भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता है। वेद, उपनिषद, गीता, रामायण आदि ग्रंथों को सभी धर्मों के लोग सम्मान देते हैं तथा गौ, गंगा, गायत्री सर्वत्र पवित्र’ मानी जाती है।  भाषायी एकता की बात करें तो पता चलता है कि यद्यपि यहां कई भाषायें बोली जाती हैं किंतु संस्कृत को सर्वाधिक प्राचीन भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। आज भी देश में संस्कृत उत्तर से लेकर दक्षिण तक जानी जाती है तथा इसे देव वाणी की संज्ञा दी जाती है।

            इसी प्रकार देश में सांस्कृतिक एकता भी विद्यमान है। भारत में प्राचीनकाल से ही शक, यूनानी, द्रविड़, कुषाण, तुर्क, मंगोल आदि जातियां आयीं। इन सभी जातियों की संस्कृति में भिन्नता थी किंतु समय बीतने के साथ ये सभी संस्कृतियां भारतीय संस्कृति में घुल मिल गयीं। यह भारतीय संस्कृति की उदारता एवं महानता है कि वह सभी संस्कृतियों के साथ समन्वय स्थापित कर लेती है।

            पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘भारत एक खोज’ (Discovery of India) में कहा कि एक भारतीय मुस्लिम या भारतीय ईसाई जब विदेश में जाता है तो वह सर्वप्रथम स्वयं को भारतीय बताता है। इसके बाद वह स्वयं को मुस्लिम या ईसाई कहता है।

            उपर्युक्त विवरण से हम एक सुस्थापित निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं अर्थात् भारत की विभिन्नताओं में ही उसकी मौलिक एकता निहित है। दूसरे शब्दों में विविधता में एकता ही भारतीय संस्कृति का मूल है। इस संबंध में प्रसिद्ध इतिहासकार स्मिथ ने लिखा है कि, ‘‘भारतवर्ष में वर्ण, वंश, वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन व रीति-रिवाज में अनगिनत भिन्नतायें मौजूद हैं। किंतु इन अनगिनत विभिन्नताओं में ही एक अखण्ड सारभूत एकता निहित है। यह एकता इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि समस्त देश का नाम भारतवर्ष है।
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