मानव अधिकार और महिलाओं के अधिकार

हाल ही में, दिल्ली विश्वविद्यालय में हुए एक सेमिनार के दौरान एक महिला वक्ता ने उदधृत किया- ‘‘हमें (महिलाओं को) ईश्वर का दर्जा नहीं वरन् इंसानों का दर्जा दो क्योंकि समाज द्वारा महिलाओं को ईश्वर का दर्जा देने के साथ-साथ कुछ निश्चित भूमिका एवं ‘तय मानकों’ के अनुसार व्यवहार की अपेक्षा की जाती है जिसके कारण उन्हें विभिन्न मानवाधिकारों से वंचन का शिकार होना पड़ता है।’’ इससे स्पष्ट है कि  आज महिलाओं को प्रतीकों एवं कल्याण कार्यक्रमों के लाभार्थी के बनाए अधिकार आधारित दृष्टिकोण से लक्षित करते हुए विभिन्न मानवाधिकारों को सुनिश्चित किया जाए, ताकि वे एक ‘गरिमापूर्ण जीवन’ का निवर्हन कर सके।

            संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् के अनुसार मानवाधिकार से तात्पर्य उन सभी अधिकारों से है जो किसी व्यक्ति के ‘गरिमापूर्ण जीवन निर्वाह’ में सहायक हो। जैसे-शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, भोजन उत्पादक कार्य आदि। उसी प्रकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान किया गया है।

            परंतु यहां प्रश्न यह उठता है कि उपर्युक्त मानवाधिकारों व संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में हम महिलाओं के साथ कितना न्याय कर पाये हैं? इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर आज भी महिला अधिकार एक संक्रमण की अवस्था मे है। एक ओर वैश्विक जागरूकता के कारण इनके राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर विभिन्न अधिकारों को सुनिश्चित किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ आज भी महिलाएं अनेक भेदभाव एवं वंचन का शिकार हैं। हालांकि इस भेदभाव का स्वरूप प्रत्येक समाज व संस्कृति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

            इस तरह यदि देंखे तो, महिलाओं के प्रति भेदभाव व ‘लैंगिक पूर्वाग्रह’ उनके जीवन के आरंभिक अवस्था अर्थात् ‘भ्रूण’ में आने के साथ ही आरंभ हो जाता है तथा समाज में लड़के की अधिक चाहत के कारण ‘भ्रूण हत्या का शिकार होती है। इसी प्रकार यदि जन्म के पश्चात् देंखे तो प्रसव के दौराव व प्रसव पश्चात् मूलभूत सुविधाओं व देखभाल में भेदभाव किया जाता है। जिसका प्रतिकूल प्रभाव माता एवं नवजात दोनों पर होता है। आज भारत में मातृत्व मृत्यु दर प्रति 1 लाख पर 178 है।

            इसी प्रकार यदि मानवाधिकार एवं जीवन स्तर को सुनिश्चित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण तत्व शिक्षा एवं रोजगार की बात करें तो, पहले तो महिलाओं की शिक्षा स्तर ही अत्यंत कम है। यदि शिक्षा दी जाती है तो लैंगिक पूर्वाग्रह के कारण कुछ निश्चित विषयों जैसे ‘गृहविज्ञान, समाज विज्ञान एवं अन्य मानिविकी विषय की क्योंकि हमारे समाज में एक ‘लैंगिक पूर्वाग्रह’ के अनुसार महिलाओं में तार्किक क्षमता कम होती है तथा वे घरेलू कार्य, केयरिंग संबंधी कार्य ही कर सकती है, क्योंकि इनमें मृदुल स्वभाव, सौम्यता, जैसे गुणों की आवश्कता होती है जो इनमें जन्मजात होते हैं। हालांकि इस बात से कुछ सीमा तक सहमत हुआ जा सकता है कि महिलाओं में ये गुण होते हैं, परंतु यह ‘केवल महिलाओं में’ या ‘सभी महिलाओं में’ होते हैं यह एक पूर्वाग्रह है क्योंकि गुण सदैव लिंग तटस्थ होते हैं।

            उपर्युक्त शिक्षा एवं कौशल के कारण महिलाओं के लिए कुछ निश्चित रोजगार क्षेत्र का निर्धारण है जैसे- प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक, रिसेप्शनिष्ट, नर्स, एयर होस्टेस आदि क्योंकि ये कार्य महिलाओं की तय भूमिका के अन्तर्गत आते हैं। जिन्हें सामूहिक रूप में ‘पिंक कॉलर जॉब’ कहा जाता सकता है। यदि महिला किसी संगठन या संस्था में कार्यरत होती है तो वहां भी महिला को प्रायः निम्न पदों पर रखा जाता है तथा निर्णय में भूमिका निर्वहन कम होती है अर्थात् उच्च पदों तक पदोन्नति में एक अप्रत्यक्ष अवरोध उत्पन्न की जाती है जिसे ‘ग्लास सिलिंग’ कहा जाता है।

            भारतीय धर्मंग्रन्थों में भी महिलाओं को बचपन में पिता पर आश्रित, युवावस्था में पति पर तथा वृद्धावस्था में पुत्र पर आश्रित रहने की शिक्षा दी गयी है और इसी पराश्रितता एवं कमजोर सामाजिक, आर्थिक स्थिति के कारण आज भी समाज में महिलाओं के प्रति अनेक प्रकार की हिंसा देखने को मिलती है। जो निम्न प्रकार है-

घरेलू स्तर पर

घरेलू हिंसा

दहेज उत्पीड़न

सार्वजनिक स्थल पर

छेड़छाड़, पीछा करना, एसिड अटैक, बालात्कार, अन्य यौन हिंसा

कार्यस्थल पर

शाब्दिक या शारीरिक रूप से यौन उत्पीड़न

साईबर अपराध

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार इसमें महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा के दरों में बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है। उपर्युक्त कारणों से ही आज महिलाएं समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी आपेक्षिक भूमिकाओं के निर्वहन में पिछड़ती जा रही है जिसके प्रमाण के रूप में विभिन्न वैश्विक सूचकांकों एवं सर्वे को देखा जा सकता है- जैसे-

‘‘मानव विकास सूचकांक’ में भारत का स्थान 13वां दर्ज किया गया है। साथ ही यू.एन.डी.वी. द्वारा जारी ‘लैंगिक असमानता सूचकांक’ में भारत का स्थान 125वां है, उसी प्रकार विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी ‘लैंगिक अंतराल रिपोर्ट’ में 144 देशों ने भारत का स्थान 87वां है तथा सामाजिक प्रगति रिपोर्ट में 93वां स्थान है।

यदि आर्थिक भागीदारी की बात करें तो जनगणना 2011 के अनुसार महिला श्रम बल भागीदारी 20.1% है, वहीं इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार श्रम बल भागीदारी के मामले में भारत 131 क्षेत्रों में 121वां स्थान रखता है।

आज की भारतीय संसद में कुल 545 में केवल 62 महिला सांसद शामिल है अर्थात् लगभग 11% ही भागीदारी है, इसी प्रकार प्रशासनिक- न्यायिक क्षेत्र में भी महिला भागीदारी अत्यंत कम पाया जाता है।

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