अनेक पीढ़ियों तक एक ही प्रकार के कार्य से सम्बद्ध समूहों को उनके कार्य के आधार पर एक जाति का स्वरूप प्राप्त होता गया। प्रारंभ में जाति व्यवस्था कार्य की कुशलता में वृद्धि लाकर सुसंगठित समाज के निर्माण में उपयोगी साबित हुई। किंतु कालांतर में जाति व्यवस्था समाज की बुराई बन गयी। इसने एक ओर लोगों के बीच पारस्परिक समन्वय एवं मेलजोल को रोंकने का कार्य किया वहीं दूसरी ओर लोगों को एक राष्ट्र के नागरिक के रूप में विकसित होने से रोका।
आगे जाति की पहचान को लेकर लोगों को संगठित किया गया। यह प्रक्रिया जातिवाद के नाम से जानी गयी। जाति समर्थक नेता अपना हित पारंपरिक ढ़ाँचे में ही सुरक्षित रख सकते हैं क्योंकि जातिगत समूहों के आधार पर ही उनका अस्तित्व टिका होता है। इस प्रकार जाति प्रथा एवं जातिवाद दो प्रमुख सामाजिक बुराइयाँ हैं, जो एक-दूसरे पर आश्रित हैं।
क्या भारत में जाति प्रथा कमजोर पड़ रही है?
- भूमण्डलीकरण के इस युग में मनुष्य को अत्यधिक स्वतंत्रता प्राप्त है। वह अब अपनी जाति के लिए निर्धारित कार्यों को करने के लिए बाध्य नहीं है। आज निम्न जाति के व्यक्ति उच्च पदों पर आसीन हो रहे हैं।
- शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ है जिसके कारण जातिगत भेदभाव एवं अस्पृश्यता को लेकर लोगों की सोच में परिवर्तन आया है।
- अंतर्जातीय एवं अंतधार्मिक विवाहों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है जो जाति व्यवस्था के प्रतिबंधों का स्पष्ट उल्लंघन है। इससे जाति प्रथा धीरे-धीरे शिथिल होती जा रही है।
- वैज्ञानिकता एवं तर्कवाद ने मानव मात्रा की समानता की वकालत की है। इसके कारण जाति संबंधी मान्यताओं को भारी आघात पहुंचा है।
- सबसे बढ़कर भारतीय संविधान में सभी को समानता का अधिकार दिया गया है तथा अस्पृश्यता को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इससे जातिगत मान्यता शिथिल हुई है।
क्या भारत में जातिवाद बढ रहा है?
- भारत में जातिवाद बढ़ रहा है क्योंकि सुख-दुख में सहभागी के तौर पर जाति को ही प्रस्तुत किया जाता है। व्यक्ति को यह आभास कराया जाता है कि जाति ही वह व्यवस्था है जो उसके संकट के समय काम आती है।
- विभिन्न जातिवादी संगठनों का निर्माण किया जाता है तथा उस जाति से संबंधित सभी सदस्यों को इस संगठन में शामिल करने का प्रयास किया जाता है।
- जातिवाद के विकास में राजनीतिक दलों की कुटिल मानसिकता काफी अधिक योगदान दे रही है। राजनीतिक दल जाति समूहों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
- जातिवादी शक्तियां अंतधार्मिक तथा अंतरजातीय विवाहों को लगातार हतोत्साहित करने के प्रयास में संलग्न रहती हैं। इन जातिवादी शक्तियों में खाप पंचायतें प्रमुख हैं।
निष्कर्षतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारत में जातिवाद एवं जातिप्रथा दो प्रमुख बुराइयाँ हैं। यद्यपि जाति प्रथा कमजोर हो रही है किंतु निहित स्वार्थी तत्वों के कारण जातिवाद की समस्या में वृद्धि हो रही है।