भारत में एवं अमेरिका के मध्य कूटनीतिक एवं राजनीतिक रिश्ते बेहद ऐतिहासिक मोड़ ले चुके हैं किंतु क्या कारण है कि दोनों देशों के मध्य आर्थिक एवं कारोबारी संबंधों में आपसी दूरी लगातार बढ़ती जा रही हैं? हालिया उदाहरणों के साथ भारत एवं अमेरिका के मध्य के आर्थिक संबंधों का सविस्तार उल्लेख कीजिए।

बराक ओबामा के समय भारत एवं अमेरिका के मध्य कूटनीतिक एवं रणनीतिक संबंध उच्च स्तर पर पहुंच गये थे। आगे जब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति निर्वाचित हुए तो ऐसी आशंकायें व्यक्त की गयी कि अब भारत एवं अमेरिका के कूटनीतिक एवं सामरिक संबंधों में गिरावट आ सकती है।

किंतु यह आशंका गलत साबित हुई और डोनाल्ड ट्रंप ने भी भारत एवं अमेरिका के बीच कूटनीतिक एवं सामरिक संबंधों को पूर्ववतः बनाये रखने का निर्णय लिया। वस्तुतः भारत एशिया में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है अतः यदि अमेरिका को एशिया में अपने को मजबूती से स्थापित करना है और चीन जैसे देशों की चुनौतियों से निपटाना है तो उसे निश्चित तौर पर भारत के साथ संबंधों को मजबूत बनाना होगा।

भारत एवं अमेरिका के मध्य आर्थिक संबंधों की कमजोरी के लिए उत्तरदायी कारण :

  • भारत सरकार के तमाम आग्रहों एवं कोशिशों के बावजूद अमेरिका ने एच-1 बी बीजा के संबंध में कोई रियायत नहीं प्रदान की है।
  • हाल ही में जारी की गयी एच-1 बी बीजा नीति से भारतीय आई.टी. कंपनियों की समस्याएं बढ़ेगी क्योंकि अमेरिका के द्वारा जितने एच-1 बी वीजा जारी किये जाते हैं उनका 60-65 प्रतिशत हिस्सा भारतीय कंपनियों के द्वारा हासिल किया जाता है।
  • इसी प्रकार भारत ने भी अमेरिका के द्वारा बार-बार आग्रह के बावजूद वहाँ से आयातित मोटर वाहनों और सौर ऊर्जा उपकरणों पर लगाये जाने वाले सीमा शुल्क में काई राहत नहीं प्रदान की है।
  • भारत के आम बजट 2018-19 में जिन आयतित उत्पादों पर सीमा शुल्कों बढ़ाया गया है वह भी अमेरिका को गलत लगा है। डोनाल्ड ट्रंप कुछ समय पहले ही कांग्रेस में अपने भाषण में भारत की ओर से अधिक शुल्क लगाने के मुद्दें की आलोचना कर चुके हैं।
  • एक ओर जहाँ अमेरिका मोटर वाहनों पर आयात शुल्क को पूरी तरह से समाप्त करने की मांग कर रहा है। वहीं भारत का कहना है कि अमेरिकी वाहन निर्माता कंपनियों को भारत में प्लांट लगाना चाहिए।
  • भारत के द्वारा कई प्रकार के लग्जरी उत्पादों पर भी सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया है। इससे अमेरिकी कंपनियों के लाभ में कमी आयी है जिससे वे चिंतित हैं।
  • सबसे बढ़कर अमेरिका भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता करना चाहता है जबकि भारत फिलहाल सिर्फ द्विपक्षीय निवेश समझौते के पक्ष में है।
निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यद्यपि भारत एवं अमेरिका के बीच कूटनीतिक एवं रणनीति संबंध नई मजबूती की ओर अग्रसर हैं किंतु आर्थित संबंध कमजोर स्थिति में है। इस समस्या के निराकरण के लिए दोनों देशों को एक-दूसरे की जरूरतों को समझना होगा और प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ाना होगा।
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