अमेरिका से संबंधित एनपीआर (Nuclear Posture Review), 2018 नाभिकीय हथियारों से संबंधित है। इसके तहत कम क्षमता वाले परमाणु बमों के विकास की बात कही गयी है। इसे जारी करने के पीछे अमेरिका का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर ऐसा रूख प्रस्तुत करना है कि वह जरूरत पड़ने पर कम क्षमता के परमाणु बमों का प्रयोग कर सकता है ताकि उन देशों को नियंत्रित किया जा सके जो लगातार अपनी परमाणु क्षमता में विस्तार कर रहे हैं।
यद्यपि अमेरिका के पास बड़ी क्षमता वाले परमाणु बम भी हैं किंतु वह नहीं चाहता कि इनसे किसी देश की बड़ी आबादी को हानि पहुंचे। कोरियाई प्रायद्वीप में जिस प्रकार से तनाव जारी है और रूस तथा चीन से अमेरिका का विरोध चल रहा है उस पृष्ठभूमि में अमेरिका की इस ‘एनपीआर’ को समझने की जरूरत है।
अमेरिका की एनपीआर विश्व को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है?
- इससे वैश्विक स्तर विशेषकर अमेरिका, रूस एवं चीन के बीच अस्त्रों को छोड़ शुरू हो सकती है जो वैश्विक शांति एवं स्थिरता के लिए खतरनाक होगी।
- इससे नाटो (NATO) का अधिक सैन्यीकरण हो सकता है जिससे यूरोप में अस्थिरता आ सकती है।
- इससे साल्ट संधि (Salt Treaty) पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। ज्ञातव्य है कि साल्ट संधि नाभिकीय हथियारों को सीमित करने से संबंधित है।
- यह पिछली अमेरिका सरकार की नीति से पूर्णतः अलग है क्योंकि पिछली ओबामा सरकार के दौरान परमाणु अस्त्रों का प्रयोग अंतिम विकल्प के रूप में करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी थी।
अमेरिका की एनपीआर का भारत पर प्रभाव
- अमेरिका की इस एनपीआर से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सैन्यीकरण एवं अस्त्र-शस्त्रों की छोड़ को बढ़ावा मिलेगा जिससे भारत का प्रभावित होना स्वभाविक है।
- इससे रूस एवं चीन आपस में नजदीक आयेंगे क्योंकि अमेरिका वैश्विक स्तर पर रूस को अलग-थलग करना चाहता है। ज्ञातव्य है कि रूस एवं चीन की नजदीकी से रूस भारत से दूर हो सकता है।
- इससे दक्षिण चीन सागर में चीन अधिक आक्रामक रूख अपना सकता है क्योंकि अमेरिका की एनपीआर एक प्रकार से उस पर दबाव बना रही है। इससे इस क्षेत्र में भारतीय हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि अमेरिका की एनपीआर (NPR) वैश्विक स्तर पर परमाणु अस्त्र-शस्त्रों को बढ़ावा दे सकती है। सबसे बढ़कर यह भारत को भी गंभीरता से प्रभावित करने की क्षमता रखती है।