नैतिकता से तात्पर्य समाज स्वीकृत मूल्यों एवं मापदण्डों का पालन होता है। इन समाज स्वीकृत मूल्यों एवं मापदण्डों में स्थान एवं समय के अनुसार परिवर्तन भी देखा जाता है। जबकि कानून का निर्माण विधायिका के द्वारा किया जाता है। इन कानूनों के उल्लंघन को दण्डनीय अपराध माना जाता है जबकि नैतिकता के उल्लंघन के लिए दण्ड दिया जाये ऐसा जरूरी नहीं है।
मानव जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं कि नैतिकता एवं कानून का पालन साथ-साथ नहीं किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि कोई भी कृत्य जो नैतिक रूप से सही है वह जरूरी नहीं है कि कानूनी रूप से भी सही हो। उदाहरण के तौर पर यदि किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करना पड़े तो यह कृत्य नैतिक रूप से तो ठीक होगा किंतु कानूनी तौर पर गलत होगा।
अपने जीवन की घटना जब कानून एवं नैतिकता के बीच द्वंद उत्पन्न हुआः
- इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान हमारे हॉस्टल में सख्त नियम था कि रात के 12 बजे के बाद कोई भी विद्यार्थी बाहर नहीं जायेगा।
- एक दिन मेरे पास रात्रि दो बजे एक घनिष्ठ मित्र का फोन आया कि उसके एक रिश्तेदार दुर्घटना में घायल हो गये हैं। उनका रक्त समूह O- . है अतः यह रक्त समूह मिल नहीं पा रहा है।
- चूंकि मेरा रक्त समूह भी O-. (ओ निगेटिव) था अतः मेरे मित्र ने मुझे फोन किया था। डॉक्टरों का कहना था कि यदि रक्त देने में देर हुयी तो दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की जान को खतरा उत्पन्न हो सकता है।
- चूंकि हॉस्टल के नियमानुसार रात्रि के 12 बजे के बाद कोई बाहर नहीं जा सकता था अतः मेरे लिए समस्या उत्पन्न हो गयी।
- एक तरफ किसी की जान बचाने का नैतिक दायित्व था तो वहीं दूसरी ओर हॉस्टल के नियमों का पालन करने की विवशता थी।
- सर्वप्रथम मैने हॉस्टल वार्डेन एवं गेटकीपर से सारी बात बतायी किंतु उन्होंने अनुमति नहीं दी।
- इस कारण से मैने हॉस्टल की चहार दीवारी फॉदकर बाहर जाने का निर्णय लिया। समय पर पहुंचकर उस व्यक्ति को रक्त दिया जिससे उसकी जान बच सकी।
निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जीवन में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती है जब एक साथ कानून एवं नैतिकता का पालन संभव नहीं हो पाता है। ऐसी स्थिति में हमें मानवहित में कदम उठाना होगा और मानवहित को ही कानून की तुलना में वरीयता देनी होगी क्योंकि कानून अंततः मानवहित के लिए ही बनाये जाते हैं।