वर्तमान विश्व बहुध्रुवीय है अर्थात् वर्तमान में विश्व किसी गुट में विभाजित नहीं है जैसा कि शीतयुद्ध के दौरान पश्चिमी एवं पूर्वी गुट बने हुए थे। इस बहुध्रुवीय विश्व में राष्ट्रीय हितों की ही प्रधानता है तथा प्रत्येक देश राष्ट्रीय हितों की पूर्ति में संलग्न है। वास्तव में मित्रों एवं दुश्मनों के बीच अंतर कर पाना बहुत कठिन है।
जासूसी प्राचीनकाल से ही अस्तित्व में रही है। इसके द्वारा पड़ोसी राज्यों की गतिविधियों पर नजर रखने के साथ-साथ अपने देश के नागरिकों पर भी नजर रखी जाती थी। इसका उद्देश्य यह होता था कि राजा हर प्रकार की गतिविधि् से परिचित हो और जरूरत पड़ने पर प्रभावी कदम उठा सके। अशोक के शासनकाल में यह व्यवस्था प्रचलित थी।
अब यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या पड़ोसी मित्र देश की जासूसी नैतिक है? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि पड़ोसी शत्रु देश की जासूसी जरूरी है क्योंकि यह मुद्दा राष्ट्रीय हितों से संबंधित है। किंतु पड़ोसी मित्र राष्ट्र की जासूसी गलत होगी।
इसका कारण यह है कि इससे आपसी विश्वास भंग हो सकता है अतः जासूसी का कदम अनैतिक होगा। हाँ राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए पड़ोसी मित्र देश की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है ताकि समय रहते समुचित कदम उठाये जा सके।
भारत के संदर्भ में इस कथन की प्रासंगिकता :
- भारत एक उपमहाद्वीपीय स्थिति वाला देश है। इसके एक ओर पाकिस्तान जैसे शत्रु देश हैं वही नेपाल, भूटान, बांग्लादेश जैसे मित्र है।
- शत्रु देश होने के नाते एवं आतंकवाद के संचालक होने के नाते पाकिस्तान पर सतर्क निगाह रखना भारत के लिए जरूरी है।
- किंतु नेपाल, बांग्लादेश एवं म्यांमार जैसे देशों में भी निगाह रखने की आवश्यकता है क्योंकि चीन लगातार इन देशों में अपनी सक्रियता बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।
- इस प्रकार पड़ोसी मित्र राष्ट्रों की गतिविधियों पर नजर रखना जरूरी है। हालॉकि नियोजित जासूसी का कदम गलत एवं अनैतिक होगा।
निष्कर्षः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व में राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि है। यद्यपि पड़ोसी मित्र राष्ट्रों की जासूसी अनैतिक है किंतु इन देशों की गतिविधियों पर सतर्क निगाह रखने की जरूरत है।