मानव सभ्यता की शुरूआत में मनुष्य अपनी जरूरत के लिए पशुओं का शिकार करता था किंतु आगे उसने पशुओं को पालना सीख लिया। इस प्रकार मानव एवं पशुओं के साथ-साथ रहने की प्रक्रिया शुरू हुयी और मानव एवं पशु एक-दूसरे के अभिन्न अंग बनते चले गये।
कालांतर में पशुओं को संस्कृति का अभिन्न अंग माना जाने लगा। उदाहरण के तौर पर हड़प्पा में कूबड़ वाले बैल तथा वैदिक काल में गाय को अत्यधिक महत्व प्रादन किया जाता था। इसी प्रकार जल्लीकट्टू को भी लोग अपने संस्कृति का अंग मानते हैं। जल्लीकट्टू के तहत बैल को अनेक प्रकार से अनियंत्रित किया जाता है तथा उस अनियंत्रित बैल को लोगों के द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है।
चूंकि इस प्रक्रिया के दौरान बैल के साथ-साथ उसे नियंत्रित करने वालों को भी गंभीर चोटों का सामना करना पड़ता है अतः पशु अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन जल्लीकट्टू को रोंकने की मांग करते रहे हैं। सबसे बढ़कर न्यायपालिका को भी जल्लीकट्टू जैसे आयोजनों ने धर्मसंकट में डाल दिया है क्योंकि यह आयोजन नैतिक एवं संवैधानिक दोनों ही रूपों में गलत है।
जल्लीकट्टू ने न्यायपालिका के समक्ष किस प्रकार नैतिक संकट उत्पन्न किया है?
- जल्लीकट्टू के दौरान बैलों के साथ जो क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया जाता है क्या उसे नैतिक माना जा सकता है।
- क्या एक मनुष्य को पशुओं के विरुद्ध हिंसा करने का अधिकार है जबकि 1960 के पशु क्रूरता रोकथाम अधिनियम के द्वारा पशुओं के विरुद्ध क्रूरता को पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया है।
जल्लीकट्टू ने न्यायपालिका के समक्ष क्या संवैधानिक संकट उत्पन्न किया है?
- क्या जल्लीकट्टू को संविधान के अनुच्छेद 29 के अंतर्गत संस्कृति का अंग माना जा सकता है। न्यायालय के समक्ष यह एक विवादित बिंदु है।
- दूसरा क्या पशुओं को भी अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार दिया जाना चाहिए जैसा कि मानव को प्रदान किया जाता है।
निष्कर्षः एक सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज के लिए जितना आवश्यक संस्कृति का संरक्षण है उतना ही जरूरी पशुओं के साथ दयालुतापूर्ण व्यवहार भी है। अतः जल्लीकट्टू का आयोजन सभ्य तरीके से किया जाना चाहिए ताकि पशुओं के अधिकारों का किसी प्रकार से हनन न हो।