यह मामला सिविल सेवा की आचरण संहिता एवं संविधान के द्वारा किये गये शक्ति के विभाजन से संबंधित हैं।
- ज्ञातव्य है कि सिविल सेवक कार्यपालिका के अंग हैं जबकि राजनेता विधायिका से संबंधित है। संविधान के द्वारा कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका के मध्य विभाजन किया गया है ताकि कोई भी एक दूसरे के अधिकार क्षेत्रों का अतिक्रमण न करें।
- इस प्रकार यदि कोई सिविल सेवक किसी राजनीतिक दल से जुड़ाव रखता है तो यह संविधान की भावना के विरुद्ध होगा।
- सिविल सेवकों को एक निर्धारित निश्चित कार्यकाल मिलता है जबकि राजनेताओं को हर पांच वर्ष के बाद चुनाव का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार यदि कोई सिविल सेवक राजनीतिक जुड़ाव रखता है तो सत्ता परिवर्तन के बाद वह अपने दायित्वों का समुचित निर्वहन नहीं कर पायेगा।
- इसी प्रकार यदि कोई सिविल सेवक राजनीतिक जुड़ाव रखता है तो वह उस राजनीतिक दल के उत्थान में ही लगा रहेगा ताकि उसे बेहतर लाभ मिल सके। इस प्रकार ऐसा सिविल सेवक सरकारी नीतियों एवं कार्यक्रमों का समुचित क्रियान्वयन नहीं कर सकेगा।
- विवाह एक निजी मामला है अतः एक नव नियुक्त सिविल सेवक के लिए किसी सत्तासीन राजनेता की पुत्री से विवाह करना गलत नहीं है।
- किंतु यहाँ सिविल सेवक को यह बात ध्यान में रखनी होगी कि वह अपने व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक जीवन में पूरी ईमानदारी के साथ कर्तव्यों का निर्वहन करे। दूसरे शब्दों में उसके निजी संबंधों का प्रभाव उसके सार्वजनिक एवं प्रशासनिक दायित्वों पर न पड़े।
- इस प्रकार उपर्युक्त मामले में प्रस्तुत समस्या का समुचित निदान किया जा सकता है और संविधान के आदर्शों को प्रतिस्थापित किया जा सकता है।