यह समस्या द्विआयामी है अर्थात् इसमें कानून एवं व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक आयाम भी जुड़ा हुआ है। एक ओर जहाँ महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराध कानून एवं व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करते हैं वहीं दूसरी ओर समाज में पितृसत्तावाद हावी है जो महिलाओं को पराधीनता की स्थिति में ही रखने का पक्षध्र है।
- इस समस्या के निराकरण के लिए प्रशासनिक स्तर तथा सामाजिक स्तर दोनों पर कार्य करने होंगे।
प्रशासनिक स्तर पर की जाने वाली कार्यवाही :
पुलिस अधीक्षक के संज्ञान में लाकर जिले के सभी पुलिस थानों को निर्देश जारी करवाये जायेंगे कि वे महिला अपराधों से संबंधित मामलों की शीघ्रता से एफआईआर दर्ज करें।
- एक विशेष प्रकोष्ठ का गठन किया जायेगा जिसमें महिला पुलिसकर्मियों को भी शामिल किया जायेगा।
- संवेदनशील स्थानों का पता लगाया जायेगा और वहाँ पुलिस बलों की पर्याप्त संख्या में उपलब्ध्ता सुनिश्चित की जायेगी।
- इसी प्रकार ऐसे स्थान जहाँ छेड़खानी की घटनायें बार-बार होती हैं वहाँ सीसीटीवी कैमरों से लगातार निगरानी रखने की व्यवस्था की जायेगी। साथ ही आपातकालीन पुलिस वाहन को सतर्क स्थिति में रखा जायेगा।
- विद्यालयों, कॉलेजों आदि में कैम्प आदि लगवाकर बच्चियों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिलाया जायेगा ताकि वे स्वयं की रक्षा करने में समर्थ हो सकें।
सामाजिक स्तर पर उठाये जाने वाले कदम :
- लैंगिक समानता के संबंध में लोगों को जागरूक बनाने के लिए अभियान का संचालन किया जायेगा।
- महिलाओं को कौशल विकास का प्रशिक्षण प्रदान करवाकर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराया जायेगा। ज्ञातव्य है कि आर्थिक सशक्तीकरण के बिना महिलाओं का सामाजिक सशक्तीकरण संभव नहीं है।
- महिलाओं के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा औपचारिक एवं अनौपचारिक समूहों की मदद ली जायेगी।
- जिले में विभिन्न स्थानों में उन महिलाओं को, जिन्होंने अपने बल पर नया मुकाम हासिल किया है, आमंत्रित कर प्रेरक भाषणों का आयोजन कराया जायेगा ताकि लोगों की पित्रृतंत्रात्मक अभिवृत्ति का प्रबंधन किया जा सके।
- इस प्रकार प्रशासनिक स्तर पर कानून व्यवस्था की स्थिति को सशक्त बनाकर और सामाजिक स्तर पर जागरूकता अभियान संचालित कर इस समस्या का समुचित निदान किया जा सकता है।