‘‘तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है ये ऑकड़े झूठे हैं, यह दावा किताबी है।’’
उपर्युक्त पक्तियाँ उन सरकारी ऑकड़ों की वास्तविकता को प्रस्तुत करती हैं जिनमें बताया जाता है कि देश का किसान खुशहाल है और बेहतर जीवन जी रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि आजादी के सात दशकों के बाद भी देश की आधी आबादी कृषि कार्य में संलग्न है। देश की जीडीपी में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों का मात्र 18 प्रतिशत ही योगदान है। इस प्रकार स्पष्ट है कि कृषि क्षेत्र अत्यधिक श्रम के बोझ से दबा हुआ है और प्रच्छन्न बेरोजगारी की समस्या से ग्रस्त है। प्रच्छन्न बेरोजगारी ऐसी स्थिति है जब जरूरत से अधिक लोग किसी कार्य में लगे होते हैं। कृषि के विकास के संबंध में सरकार की नीतियों एवं प्रयासों की बात की जाये तो पता चलता है कि शुरूआत से ही सरकार इस संबंध में संवेदनशील थी। जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया गया तथा नया भूमि बंदोबस्त लागू किया गया। इससे लोगों को ब्रिटिशकालीन शोषणकारी भू-राजस्व व्यवस्था से छुटकारा मिल गया।
हदबंदी व्यवस्था को लागू किया गया तथा एक व्यक्ति के लिए भूमि की सीमा निर्धारित की गयी। इसका उद्देश्य यह था कि किसी भी व्यक्ति के पास एक निश्चित सीमा तक ही जमीन रहे और शेष जमीन उससे लेकर भूमिहीन कृषकों को दे दी जाये।
किंतु उपर्युक्त नीतियों का उद्देश्य बेहतर होने के बावजूद इन्हें ठीक से लागू नहीं किया जा सका। बड़े भू-स्वामियों ने हदबंदी सीमा से बाहर आने वाली भूमि को अपने रिश्तेदारों, परिचितों तथा परिवार वालों के नाम कर दी। इससे वे हदबंदी के कारण छीनी जाने वाली भूमि देने से बच गये और अप्रत्यक्ष रूप से उस जमीन पर अपना कब्जा बनाये रखा।
इसी प्रकार आगे वर्ष 1966 में सरकार के द्वारा हरित क्रांति की शुरूआत हुई। इसके तहत उच्च उत्पादकता वाले बीजों, उर्वरकों तथा सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करायी गयी जिससे उत्पादन में भारी वृद्धि हुयी। किंतु इसका लाभ सिर्फ पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को ही मिल पाया। इस प्रकार हरित क्रांति ने भारत को अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भर तो बना दिया किंतु संपूर्ण देश में इसका क्रियान्वयन न होने के कारण यह अधिकांश किसानों के लिए लाभकारी नहीं बन पायी।
किसानों की सबसे बड़ी समस्या संस्थागत ऋण की सुविधा प्राप्त करने की है। हालॉकि सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड तथा अन्य सुविधायें प्रदान की हैं ताकि किसानों को आसानी से धन उपलब्ध हो सके। किंतु बैंकिंग क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं स्वयं किसानों में जागरूकता के अभाव के चलते वे सेठ, साहूकारों आदि से ही ऋण लेने के लिए बाध्य होते हैं।
इन स्रोतों से कर्ज लेने के कारण किसान एक दुश्चक्र में फँस जाते हैं और वर्षों तक कर्ज के जंजाल से बाहर नहीं निकल पाते हैं। कर्ज के बढ़ते बोझ के कारण कई किसान तो आत्महत्या तक कर लेते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों के अनुसार वर्ष 1995 से अब तक तकरीबन 3 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
किसानों की समस्या समुचित ऋण सुविधा प्राप्त करने तक ही सीमित नहीं हैं। किसानों को उनके उत्पादों का सही मूल्य भी नहीं मिल पाता है फलस्वरूप वे अपने उत्पाद दलालों के हाथों कम दाम पर बेंचने के लिए बाध्य होते हैं। यद्यपि सरकार के द्वारा न्यनतम समर्थन मूल्य पर किसानों के उत्पादों को खरीदने की सुविधा प्रदान की गयी है किंतु इस सुविधा का लाभ अधिकांशतः बड़े किसान ही उठा पाते हैं। छोटी जोत वाले किसानों को इससे अधिक लाभ नहीं मिल पाता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य खरीद केंद्रों में स्थानीय दलालों एवं सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से छोटे एवं सीमांत किसानों को अधिक लाभ नहीं मिल पाता है।
इस प्रकार देश का अन्नदाता स्वयं गरीबी एवं मूलभूत आवश्यकताओं से रहित जीवन जीने को बाध्य होता है। अदम गोण्डवी की ये पंक्तियाँ इस संदर्भ में प्रासंगिक हैं-
‘‘घर के ठण्डे चूले में अगर खाली पतीली है, तो बताओं कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।’’
किसानों को मौसम की सही जानकारी उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने भारतीय मौसम विभाग की स्थापना की है किंतु भारतीय मौसम विभाग के द्वारा दी गयी जानकारी अधिकांशतः गलत ही साबित होती है। इस प्रकार यहाँ भी क्रियान्वयन की खामी दिखायी देती है।
इसी प्रकार किसानों को फसल बीमा की सुविधा उपलब्ध करायी गयी किंतु सही आकलन की सुविधा का न होना और समय से मुआवजा आदि न मिलने आदि से ये योजनाएं अधिक सफल नहीं रही हैं। रही-सही कसर किसानों में जागरूकता के अभाव ने पूरी कर दी।
इसी प्रकार आधारभूत सुविधाओं के अभाव के चलते किसानों को सही ढंग से लाभांवित करना कठिन होता जा रहा है। सिंचाई की सुविधा का अभाव, गुणवत्तापूर्ण बीजों एवं उर्वरकों का अभाव, कोल्ड स्टोरेज का अभाव तथा विपणन की व्यवस्था के अभाव से किसानों की आय में समुचित वृद्धि नहीं हो सकी है।
इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से पता चलता है कि सरकार के द्वारा कई प्रयास किये गये हैं किंतु अधिकारियों एवं कर्मचारियों में भ्रष्टाचार, सहानुभूति की कमी के कारण अधिकांश कार्यक्रमों एवं नीतियों का सही क्रियान्वयन नहीं हो सका है।
इस स्थिति में सुधार के लिए तथा सरकार के द्वारा निर्धरित लक्ष्य (वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करना) को पूरा करने के लिए निम्न उपायों पर ईमानदारीपूर्वक अमल करना जरूरी होगा।
सर्वप्रथम किसानों को सिंचाई, विद्युत, कोल्ड स्टोरेज, विपणन आदि की सुविधाएं उपलब्ध करानी होगी। साथ ही कम से कम प्रत्येक जिले में एक ऐसी सरकारी एजेंन्सी की स्थापना करनी होगी जो किसानों को कम से कम दाम में गुणवत्तापूर्ण बीज, उर्वरक एवं कीटनाशक उपलब्ध करा सके। इसके साथ ही किसानों को कृषि कार्य के साथ-साथ अन्य कार्यों मसलन पशुपालन एवं बागवानी के लिए प्रोत्साहित करना होगा।
पशुपालन एवं बागवानी के लिए किसानों को आसान वित्त की सुविधा उपलब्ध करानी होगी तथा उनके उत्पादों के लिए विपणन (खरीदने आदि) की सुविधा प्रदान करनी होगी। पशुपालन एवं बागवानी से सतत कृषि को बढ़ावा दिया जा सकेगा।
वर्तमान सरकार इस दिश में प्रयासरत है तथा काफी गंभीरता से किसानों एवं कृषि की दशा को सुधारने के प्रयास किये जा रहे हैं। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना को लागू किया गया है जिसका ध्येय ‘‘हर खेत को पानी तथा हर बूंद अधिक फसल है।’’ इसी प्रकार किसान अपने खेतों की उर्वरा शक्ति को ठीक ढंग से जान सकें और तद्नुरूप उर्वरकों का प्रयोग कर सकें, इसके लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किये जा रहे हैं।
किसानों को विपणन की सही सुविधा उपलब्ध कराने के लिए एपीएमसी एक्ट में सुधार किये जा रहे हैं तथा ई-नाम जैसा ऑनलाइन प्लेटपफॉर्म प्रदान किया गया है। ई-नाम के जरिए किसान देश के किसी भी राज्य की मंडी का भाव जान सकेगा तथा वहाँ के व्यापारियों से व्यापारिक क्रियाएं संपन्न कर सकेगा।
किसानों एवं कृषि की स्थिति में सुधार के लिए हाल ही में देश की राजधानी नई दिल्ली में एग्रीकल्चर 2022 का आयोजन किया गया। साथ ही वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लिए अशोक दलवई की अध्यक्षता में एक समिति की नियुक्ति की गयी।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि सरकार के द्वारा हमेशा कृषि एवं किसानों की स्थिति में सुधार के लिए बेहतर नीतियाँ एवं कार्यक्रम लागू किये गये। किंतु इनका सही क्रियान्वयन न होने के कारण न तो कृषि की स्थिति में अपेक्षानुरूप परिवर्तन लाया जा सका और न ही किसानों को लाभांवित किया जा सका। इस प्रकार जरूरत इन नीतियों एवं कार्यक्रमों को बेहतर ढंग से ईमानदारी पूर्वक लागू करने की है। यदि ऐसा किया जा सका तो निश्चित तौर पर कृषि की स्थिति में अपेक्षानुरूप बदलाव लाया जा सकेगा और किसानों की आय को दोगुना भी किया जा सकेगा।