‘‘परोपकाराय सतां विभूतयः’’ अर्थात् परोपकारिता सज्जनों की विभूति है।
भारतीय संस्कृति में परोपकारिता का गुण बहुत ही गहराई से समाया हुआ है। परोपकार से तात्पर्य दूसरों की सहायता करने से है। यह परोपकारिता समाज के लागों के बीच आसानी से देखी जाती है। वस्तुतः जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे की मदद करता है या कोई देश दूसरे देश की मदद करता है तो परोपकारिता के गुण को स्पष्टतः परिलक्षित किया जा सकता है। इस प्रकार परोपकारिता का दायरा बहुत व्यापक है।
परोपकारिता के संदर्भ में भारतीय इतिहास में प्राचीनकाल से वर्तमान समय तक कई उदाहरण प्राप्त होते हैं। राजा शिवि का एक कबूतर की जान बचाने के लिए स्वयं के शरीर को दान करने के लिए तैयार होना, महर्षि दधीचि का देवताओं के हित के लिए अपने शरीर का त्याग, सम्राट अशोक का अपने राज्य के नागरिकों के साथ-साथ पशु पक्षियों के लिए भी चिकित्सालय आदि की व्यवस्था करना इसी परोपकार की श्रेणी में आता है।
महात्मा बुद्ध का बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, महावीर का परस्परोग्रहो जीवानाम गुरुनानक का सरबत दा भला तथा महात्मा गांधी का सर्वोदय एवं अंत्योदय इसी परोपकारिता के उदाहरण है।
इसी प्रकार तमाम भक्ति संतों तथा सूफी संतों ने तत्कालीन विषमतापूर्ण सामाजिक दशा का विरोध किया तथा एक ऐसा वातावरण सृजित करने का प्रयास किया जहाँ सभी लोग पारस्परिक सद्भाव के साथ रह सकते थे। इन संतों ने तत्कालीन सत्ता तक से विरोध किया ताकि इस विषमतापूर्ण स्थिति को बदला जा सके। क्या इन संतों के कार्यों को परोपकार की श्रणी में नहीं रखा जाना चाहिए।
महात्मा गांधी, डॉ. अम्बेडकर, सुभाष चन्द्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, लाला लाजपत राय तथा अनेक क्रांतिकारियों ने जिस प्रकार से ब्रिटिश सरकार का विरोध किया और निज हितों को त्यागकर संघर्ष का रास्ता अपनाया उसे क्या परोपकार की श्रेणी से बाहर किया जा सकता है। परोपकार के संदर्भ में कवि रहीम की ये पंक्तियाँ काफी प्रासंगिक हैं-
‘‘रहिमन यों सुख होत है उपकारी के संग, बाँटनवारे को लगै, ज्यों मेंहदी को रंग।’’
भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात् जब संविधान बनाने की प्रक्रिया शुरू हुयी तो भारत को कल्याणकारी राज्य के रूप में प्रस्तुत करने की बात रखी गयी। इसके तहत बच्चों, महिलाओं, वृद्धों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए व्यापक प्रावधान किये गये ताकि इन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके।
क्या संविधान के इन प्रावधानों को परोपकार की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। निश्चित तौर पर ये प्रावधान परोपकार की श्रेणी में शामिल किये जाने के योग्य हैं क्योंकि इनके बिना वंचित एवं पिछड़े वर्गों को विकास की मुख्य धारा में लाना कठिन हो जाता।
वर्तमान समय में सरकार के द्वारा संचालित कल्याणकारी योजनाएं मसलन मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री उज्जवला योजना, सहज बिजली हर घर योजना तथा कौशल विकास सहित अन्य विभिन्न योजनाओं का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों का उद्धार करना ही है। इस प्रकार इन योजनाओं को भी परोपकार की श्रेणी में शामिल किया जाना जरूरी है।
उपर्युक्त विवरण के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्राचीनकाल से वर्तमान समय तक परोपकारिता जारी है किंतु उसका स्वरूप परिवर्तित हो रहा है। आज परोपकारिता का फलक काफी व्यापक हो गया है। आपदा के दौरान एक देश के द्वारा दूसरे देश को दी गयी मदद निश्चित तौर पर परोपकारिता की श्रेणी में ही आती है। उदाहरण के तौर पर मालद्वीव के जल संकट के दौरान भारत की मदद हो या नेपाल की भूकंप त्रासदी के दौरान बचाव एवं राहत कार्य में भारत के द्वारा बढ़चढ़कर हिस्सा लेना परोपकारिता का ही प्रमाण है।
वर्तमान के भूमण्डलीकरण के युग में जिस प्रकार से उपभोक्तावादी एवं आत्मकेंद्रित प्रवृत्ति हावी है, उसके कारण परोपकारिता जैसे गुणों में काफी कमी आयी है। इसका कारण व्यक्ति का स्वयं की समस्याओं में ही उलझा रहना है। किंतु इस स्थिति में भारत जैसे देशों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयत्न जारी रखा है। वस्तुतः इसका कारण भारतीय संस्कृति की उदारता ही है जिसमें परोपकार को अहम स्थान प्रदान किया गया है।
किंतु भारतीय परोपकारिता की तुलना में जब हम पश्चिमी देशों की परोपकारिता का आकलन करते हैं तो कमोवेश एक ही जैसी प्रवृत्ति देखने को मिलती है। इन देशों में कुछ धनी लोग तथा विभिन्न प्रकार के गैर सरकारी संगठन मानव हित में संलग्न हैं। हाल के समय में पश्चिमी देशों में परोपकारिता के संदर्भ में एक नयी प्रवृत्ति विश्वव्यापी स्वरूप धारण किये हुए हैं। इस नवीन प्रवृत्ति के जन्मदाता बिल गेट्स तथा बारेन बफेट जैसे उद्योगपति हैं।
इन संपत्ति धरकों ने अपनी अकूत संपत्ति मानव हित में लगा दी है तथा ‘जॉय ऑफ गिविंग’ (Joy of Giving) का आनंद ले रहे हैं। बिल गेट्स ने बिल एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की स्थापना की है जिसके माध्यम से वे एशिया अफ्रीका के पिछड़े देशों में रोगों के निवारण तथा शिक्षा के विकास का कार्य कर रहे हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि पश्चिमी परोपकारिता एवं भारतीय परोपकारिता कमोबेश एक जैसी ही हैं किंतु पश्चिमी परोपकारिता का फलक काफी व्यापक है। इस मॉडल ने त्याग एवं दान से अलग हटकर कल्याणकारी कार्यों तक अपना विस्तार किया है। सबसे बढ़कर पश्चिमी देशों के परोपकारी दुनिया भर में स्वयं जाकर अपने कार्यक्रमों एवं योजनाओं की निगरानी भी करते हैं। जिससे इनके द्वारा संचालित कार्यक्रमों की प्रभावकारिता बढ़ जाती है।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि भारतीय परोपकारिता हो या पश्चिमी समकालीन परोपकारिता दोनों में काफी समानताएं हैं। एक प्रकार से परोपकारिता के मूल्य निरंतर प्रवाहमान रहे हैं। किंतु यहाँ भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि गेट्स एवं बारेन बफेट जैसे लोगों तथा अनेक अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों ने प्राचीन परोपकारिता के मूल्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत कर एक नवीन स्वरूप प्रदान किया है।