3- कुड़प्पा क्रम की चट्टानें-
इन चट्टानों का निर्माण धारवाड़ क्रम के निच्छेदन एवं अपरदन से हुआ। ये अपेक्षाकृत कम रूपान्तरित हैं। परन्तु इनमें भी जीवाश्म का अभाव पाया जाता है। इन चट्टानों का नाम आंध्रप्रदेश के कुड़प्पा जिला के नाम पर पड़ा था। यह चट्टान भी भारत के वृहद क्षेत्रों में पायी जाती है।
ये चट्टानें आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान तथा हिमालय के कुछ क्षेत्रों में पायी जाती है। कृष्णा घाटी, नल्लमलाई श्रेणी, चेयार श्रेणी तथा पापाधानी श्रेणी में इन चट्टानों का विस्तार पाया जाता है। इस चट्टानी समूह का निर्माण सेल, क्वार्टजाइट, स्लेट तथा चूना पत्थर से हुआ है।
धारवाड़ चट्टानों की अपेक्षा कुड़प्पा चट्टानें आर्थिक दृष्टि से कम महत्वपूर्ण हैं। इन चट्टानों से लोहा, मैग्नीज, कुड़प्पा तथा करनूल जिला में संगमरमर, एस्बेस्टस तथा रंगीन पत्थर प्राप्त किए जाते हैं। पूर्वी राजस्थान में इन्ही चट्टानों से तांबा, कोबाल्ट, रागा इत्यादि की प्राप्ति होती है।
4- विन्ध्यन क्रम की चट्टानें-
इनका निर्माण कुड़प्पा क्रम के चट्टानों के बाद हुआ । इनका नाम विंध्याचल के नाम पर पड़ा। यह परतदार चट्टानें हैं जिनका निर्माण जल निक्षेपों के द्वारा हुआ है। यह निक्षेप समुद्र एवं नदी घाटियों में हुए थे। इस बात का प्रमाण विंध्याचल से प्राप्त होने वाले लाल बलुआ पत्थर से होता है। यह चट्टान लगभग 1 लाख वर्ग किलोमीटर में हुआ है।
इस चट्टानी समूह का विस्तार आगरा, मध्यप्रदेश के होसंगाबाद तक हैै। यह पूूर्व में झारखंड, साहसाराम ( बिहार ), रोहतक होते हुए पश्चिम में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ तक फैला हुआ है। इन चट्टानों में चूने का पत्थर, बलुआ पत्थर, चीनी मिट्टी इत्यादि की प्राप्ति होती है।सीमेण्ट उद्दोग का प्रमुख आधार चूना पत्थर होता है। इन चट्टानों से मध्यप्रदेश के पन्ना तथा आंध्रप्रदेश के गोलकुण्डा से हीरा की प्राप्ति होती है।