भारत छोड़ो आन्दोलन में गांधी जी की भूमिका

गांधी जी ने जब भारत छोड़ो प्रस्ताव का विचार प्रस्तुत किया तो साथ ही उन्होने कांग्रेस को यह चुनौती भी दे डाली की अगर संघर्ष का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया तो मै देश की बालू से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर दूंगा। नतीजन कांग्रेस कार्यसमिति ने वर्धा की अपनी बैठक में संघर्ष के प्रस्ताव को अपनी स्वीकृति दे दी। गांधी जी के भाषण का बिजली की तरह असर हुआ।

सबसे पहले उन्होंने यह स्पष्ट किया की असली संघर्ष इसी क्षण से शुरू हो रहा है। अपने केवल अपना फैसला करने का संपूर्ण दायित्व मुझे सौंपा है। अब मैं वायसराय से मिलूंगा और उनसे कहूंगा की वे कांग्रेस का प्रस्ताव स्वीकार कर लें। इसमें दो या तीन हफ्ते लग जाएंगे, लेकिन इतना आप निश्चित जान ले कि मंत्रिमंडल  वगैरह पर वाएंसराए से कोई समझौता नहीं करने जा रहा हूं, संपूर्ण आजादी से कम किसी भी चीज से में संतुष्ट होने वाला नहीं हूं। हो सकता है कि वे नमक, टैक्स , शराबखोरी आदि खत्म करने का प्रस्ताव दे, लेकिन मेरे शब्द होंगे , आजादी से कम कुछ भी नहीं इसके बाद ही उन्होने करो य मरो का नारा दिया, एक मंत्र है, छोटा सा , जो मै आपको देता हूं उस आप अपने हृदय में अंकित कर सकते है और अपनी सांस सांस द्वारा व्यक्त कर सकते है। वह मंत्र है करो य मरो या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या इस कोशिश में अपनी जान दे देंगे। अपनी गुलामी का स्थायीत्व देखने के लिए हम जिंदा नहीं रहेंगे।

भारत छोड़ो आन्दोलन  का विस्तार पहले शहरी क्षेत्रों में हुआ तत्पश्चात यह ग्रामीण क्षेत्रों में भी आग की तरह फैल गया। 

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