तुगलक काल में सुलतानों ने इमारतों की भव्यता सुंदरता स्थान पर सादगी और विशालता पर अधिक बल दिया तथा मितव्ययिता की नीति अपनाई। वास्तुकला में दीवारों को ढलवा रूप में बनाया गया है जिसे सलामी कहा गया है।
तुगलकाबाद- इसका निर्माण ग्यासुद्दी तुगलक ने दिल्ली के पास ऊंची पहाड़ियों पर कराया था। उसने इसमें एक दुर्ग का निर्माण भी करवाया। नगर प्रवेश के लिए 52 दरवाजे बनवाए गए तथा यहां के सुन्दर राजमहल में जनाना खाना ,तहखाना ,बरामदा आदि निर्माण करवाया गया।
ग्यासुद्दीन का मकबरा- यह मक़बरा मिस्र के पिरामिडों की तरह अन्दर की ओर झुका हुआ है।इसके मकबरे के ऊपर संगमरमर का गुंबद बना है। Esmeइ हिन्दू मंदिरो की शैली के आधार पर आमलक और कलश का प्रयोग किया गया है। इस मकबरे की ऊंचाई लगभग 81 फुट है।यह मक़बरा कुल मिलाकर भव्य और सुन्दर है।
जन्हापनाह नगर- इसका निर्माण मुहम्मद तुगलक ने सिरी और राएपिथौरा के मध्य में करवाया था। सुल्तान एक ऐसे नगर कि स्थापना करना चाहता था जो बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रहे तथा वहां की जनता को किसी तरह का कष्ट ना हो।
फिरोजशाह कोटला- फिरोज तुगलक ने दिल्ली में शाहजंहा बाद से दुगने क्षेत्रफल के फिरोजशाह दुर्ग का निर्माण करवाया। इसकी चार दिवारी के अंदर अनेक भवनों का निर्माण करवाया गया। प्रवेश हेतु द्वा पश्चिम में बना है। अंबालाअ के टॉपरा गांव से अशोक का स्तंभ उठाकर एसदुर्ग में स्थापित करवाया गया