1.भरतनाट्यम (तमिलनाडु)
- भरतमुनि का नाट्यशास्त्र से शास्त्रीय नृत्य की उत्पत्ति (भरतनाट्यम = भरतमुनि + नाट्य)
- भरतनाट्यम को एकहार्य के रूप में जाना जाता है
- नर्तिकी एकल प्रस्तुति में कई भूमिकाएं करती है l
- राजासर सरफ़ोजी के संरक्षण में तंजौर के प्रसिद्ध चार भाइयों द्वारा इस नृत्य का विकास किया गया था l
- देवदासियों द्वारा इस शैली को जीवित रखा गया जिनमें ‘बाला सरस्वती’ बहु परिचित नाम हैं l
- बीसवीं शताब्दी में रुकमणी देवी अरुंडेल और ई. कृष्ण अय्यर के प्रयासों ने इस नृत्य को पर्याप्त सम्मान दिलाया l
प्रदर्शन अनुक्रम :
1. अलारिपु- शाब्दिक अर्थ- फूलों से सजावट जिसमें आधारभूत नृत्य मुद्राएं की जाती हैं l
2. जातिस्वरम- यह एक लघु शुद्ध खंड होता है, जो कर्नाटक संगीत के किसी भाग के संगीतात्मक स्वर के साथ प्रस्तुत किया जाता है l
3. शब्दम- यह गीत में अभिनय को समाविष्ट करता है l
4. वर्णनम- नृत्य और नृत्त का सम्मिश्रण (ताल + राग)
5. पद्म- प्रेम और बहुधा धार्मिक पृष्ठभूमि पर आधारित इसमें 7 पंक्ति युक्त वंदना होती हैं l
6. जवाली- यह भी प्रेम पर आधारित परंतु अपेक्षाकृत तीव्र गति के साथ लघु प्रेमगीति काव्य होता है l
7. तिल्लाना- अंत तिल्लाना के साथ जहां इसकी उत्पत्ति हिंदुस्तानी संगीत के तराना में होती है वहीं इसमें बहुविचित्र नृत्य भंगिमाओं के साथ नारी सौंदर्य को दिखाया जाता है l
जो व्यक्ति नृत्य का कविता पाठ करता है उसे नट्टुवनार कहते हैं l