महाभियोग

यदि राष्ट्रपति संविधान का उल्लंघन के या उसका अतिक्रमण करे तो संसद उस पर अनुच्छेद 61 के अन्तर्गत महाभियोग चलाकर उसे पांच वर्ष की अवधि समाप्त होने से पूर्व भी अपदस्थ कर सकती है। महाभियोग एक न्यायिक प्रक्रिया है जोकि संसद में चलाई जाती है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत यदि संसद का कोई भी सदन दूसरे सदन में राष्ट्रपति संविधान के अतिक्रमण का आरोप लगाता है तो दूसरा सदन उस आरोप को स्वयं जांच करता है या किसी जांच आयोग द्वारा जांच करवाता है।

ईसा आरोप तब तक कोई सदन नहीं लगा सकता जब तक कि-

1. चौदह दिन की लिखित सूचना देकर सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर करके प्रस्थापना अंतरविष्ट करने वाला संकल्प नहीं किया गया हो।

2. उस सदस्य की कुल सदस्य संख्या के दो तिहाई बहुमत द्वारा ईसा संकल्प पारित नहीं किया गया है।

Rastrpatरा को यह अधिकार है कि वह स्वयं संसद में एसऐ अधिवेशन में उपस्थित होकर अथवा अपने किसी प्रतिनिधि को सदन में भेजकर स्वयं को दोष हीन सिद्ध करने का प्रयास कर सकता है। यदि उक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति पर लगाया गया आरोप सिद्ध हो जाता है तो आरोप जांच करने वाला सदस्य कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो तिहाई बहुमत से उस संकल्प को पारित कर देता है। पारित किए जाने के पश्चात संकल्प को दूसरे सदन में भेज दिया जाता है, जहां पर पुनः संकल्प पर विचार विमर्श होता है। यदि वहां भी यह संकल्प कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो तिहाई बहुमत से पारित हो जाए तो महाभियोग का संकल्प पारित समझा जाता है तथा उसी दिन से राष्ट्रपति को पद मुक्त कर दिया जाता है ।

महाभियोग के विरूद्ध किसी न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती। अनुच्छेद 56 से 61 के अनुसार राष्ट्रपति को महाभियोग के सिवाय अन्य किसी विधि द्वारा नहीं हटाया जा सकता।

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