डच आधुनिक नीदरलैंड के निवासी थे। डचों का पहला अभियान दल 1595-96ई. में कार्नेलियस आउटमैन के नेतृत्व में पूर्वी देशो के साथ व्यापार करने के लिए भारत पहुंचा।
कार्नेलियस भारत आने से पहले सुमात्रा द्वीप पर रुका था।तथा वहा के राजा वान्टम ने कार्नेलियस का स्वागत किया और वहाँ का दरवाजा डचों के व्यपार के लिए खोल दिया।
1595-1601 ई. तक डचों ने पूर्वी देशो के साथ 15 समुद्री यात्रायें की। 1602 ई. में द यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कम्पनी नीदरलैंड की स्थापना हुई और इसी कंपनी का भारत में विस्तार हुआ। इस कंपनी का मूल नाम बरनीज्ड ओस्ट इण्डनेसे कंपनी (voc) था।
डच कंपनी की देख रेख के लिये 17 कंपनियों का एक बोर्ड बनाया गया जो डच सरकार के आदेशानुसार कार्य करते थे। डच ईस्ट इंडिया कंपनी की शुरुआती पूंजी 65 लाख गिलटर थी। कंपनी को नीदरलैंड सरकार के द्वारा 21 वर्षों के लिए भारत सहित पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने तथा उन पर विजय करने, आक्रमण करने का आदेश जारी किया गया।
1605 ई. तक डचों ने पुर्तगालियों से अम्बाना , इंडोनेशिया के द्वीप इत्यादि जीत लिया और उस पर अधिकार कर लिया। 1605 ई. में ही पादरी वादर हेग के नेतृत्व में आंध्रप्रदेश के मसूलीपट्टनम नामक स्थान पर पहली डच फैक्टरी स्थापित की गई।
डचों ने अपनी दूसरी फैक्टरी आंध्रप्रदेश के ही निजमापट्टनम में स्थापित की। 1610 ई. में डचों ने चंद्रगिरि के राजा के साथ समझौता किया और पुलिकट में एक फैक्टरी स्थापित की। और यही पुलिकट आगे चलकर डचों का मुख्यालय बना।