कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश)
· यह मूलतः ‘कुस्सेल्वा’ नाम से विख्यात विख्यात अभिनेता ग्राम-ग्राम जाकर इसकी प्रस्तुति देते हैं l
· 17 वीं शताब्दी में एक प्रतिभाशाली वैष्णो कवि तथा दृष्टा सिद्धेन्द्र योगी ने यक्षगान के रूप में इस शैली की कल्पना की l
· इसमें कलाकारों की दक्षता प्रदर्शित करने हेतु पीतल की थाली की किनारी पर तथा सिर पर पानी से भरा घड़ा रखकर नृत्य किया जाता है l
· इस नृत्य की दो शैलियां हैं- नृत्य नाटक और एकल नृत्य-प्रस्तुति
· यह नृत्य मुख्यता भागवत पुराण की कहानियों पर आधारित है परंतु इसका केंद्रीय भाव पंथनिरपेक्ष रहा है l
प्रदर्शन अनुक्रम :
1.प्रार्थना- इसकी शुरुआत गणेश वंदना एवं अन्य देवताओं के आह्वान से होती है
2. अवर्णनात्मक- अवर्णनात्मक तथा काल्पनिक नृत्य की प्रस्तुति
3. नृत्य- इसमें की प्रस्तुति की जाती है l
4.शब्दम्- इसमें वर्णनात्मक प्रस्तुति की जाती है जैसे- दशावतार
5. कलापम्- इसमें परंपरागत नृत्य की प्रस्तुति की जाती है, जैसे- सत्यभामा
6. दृश्य काव्य- इसमें गाये के प्रत्येक शब्द की नृत्य की मुद्राओं द्वारा प्रस्तुति की जाती है l
7. तरंगम- और सबसे अंत में कृष्ण लीला तरंगिणी के उद्धरण गाए जाते हैं l
वाद्ययंत्र- वायलिन, वीणा, मंजीरा
प्रमुख कलाकार- भावना रेड्डी, यामिनी रेड्डी, राजा और राधा रेड्डी