भारतीय शास्त्रीय नृत्य भाग-4

कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश)

·       यह मूलतः ‘कुस्सेल्वा’ नाम से विख्यात विख्यात अभिनेता ग्राम-ग्राम जाकर इसकी प्रस्तुति देते हैं l

·       17 वीं शताब्दी में एक प्रतिभाशाली वैष्णो कवि तथा दृष्टा सिद्धेन्द्र योगी ने यक्षगान के रूप में इस शैली की कल्पना की l

·       इसमें कलाकारों की दक्षता प्रदर्शित करने हेतु पीतल की थाली की किनारी पर तथा सिर पर पानी से भरा घड़ा रखकर नृत्य किया जाता है l

·       इस नृत्य की दो शैलियां हैं- नृत्य नाटक और एकल नृत्य-प्रस्तुति 

·       यह नृत्य मुख्यता भागवत पुराण की कहानियों पर आधारित है परंतु इसका केंद्रीय भाव पंथनिरपेक्ष रहा है l

प्रदर्शन अनुक्रम :

1.प्रार्थना- इसकी शुरुआत गणेश वंदना एवं अन्य देवताओं के आह्वान से होती है

2. अवर्णनात्मक- अवर्णनात्मक तथा काल्पनिक नृत्य की प्रस्तुति

3. नृत्य- इसमें की प्रस्तुति की जाती है l

4.शब्दम्- इसमें वर्णनात्मक प्रस्तुति की जाती है जैसे- दशावतार

5. कलापम्- इसमें परंपरागत नृत्य की प्रस्तुति की जाती है, जैसे- सत्यभामा

6. दृश्य काव्य- इसमें गाये के प्रत्येक शब्द की नृत्य की मुद्राओं द्वारा प्रस्तुति की जाती है l

7.  तरंगम-  और सबसे अंत में कृष्ण लीला तरंगिणी के उद्धरण गाए जाते हैं l

 वाद्ययंत्र- वायलिन, वीणा, मंजीरा

 प्रमुख कलाकार- भावना रेड्डी, यामिनी रेड्डी,  राजा और राधा रेड्डी 

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