इस समिति का गठन भारत सरकार अधिनियम 1919 के अंतर्गत पहली बार 1921 में हुआ और तब से यह अस्तित्व में है। वर्तमान में इस में 22 सदस्य हैं (15 लोकसभा से तथा 7 राज्यसभा से)। प्रतिवर्ष संसद द्वारा इसके सदस्यों में से समानुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के अनुसार एकल हस्तांतरणीय मत के माध्यम से लोग लेखा समिति के सदस्यों का चुनाव किया जाता है। इस प्रकार इसमें सभी पक्षों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो जाता है। सदस्यों का कार्यकाल 1 वर्ष का होता है। समिति मैं किसी मंत्री का निर्वाचन नहीं हो सकता। समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा लोकसभा सदस्यों में से की जाती है 1961 से एक परंपरा चली आ रही है कि समिति का अध्यक्ष विपक्षी दल से ही चुना जाता है।
समिति के कार्यों के अंतर्गत नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के वार्षिक प्रतिवेदन की जांच प्रमुख है, जो कि राष्ट्रपति द्वारा संसद के प्रस्तुत किया जाता है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक राष्ट्रपति को तीन प्रतिवेदन सौंपता है- विनियोग लेखा पर लेख- परीक्षा प्रतिवेदन, वित्त लेखा पर लेखा-परीक्षा प्रतिवेदन तथा सार्वजनिक उद्यमों पर लेखा परीक्षा प्रतिवेदन।
समिति सार्वजनिक व्यय में तकनीकी अनियमितता की जांच मात्र कानूनी औपचारिक दृष्टिकोण से ही नहीं करनी बल्कि अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखने के अतिरिक्त समझदारी और विवेक तथा उपयुक्तता के दृष्टिकोण से भी करती हैं, ताकि अपव्यय, क्षति, भ्रष्टाचारी, अक्षमता तथा निरर्थक खर्चों के मामले सामने लाए जा सकें।
विस्तार में जाने के लिए समिति के निम्नलिखित कार्य हैं
1. केंद्र सरकार की विनियोग लेखा तथा वित्त लेखा की जांच करने के साथ ही लोकसभा में प्रस्तुत किसी की लेखा की भी जांच करना। विनियोग लेखा वास्तविक खर्च की तुलना संसद द्वारा स्वीकृत खर्च से करता है, जबकि वित्त लेखा केंद्र सरकार के भुगतानों तथा प्राप्तियों को दर्शाता है।
2. विनियोग लेखा तथा इस पर आधारित नियंत्रक महालेखा परीक्षक के लेखा प्रतिवेदन की संवीक्षा के दौरान समिति को निम्नलिखित मुद्दों पर आश्वस्त हो लेना पड़ता है-
(क) कि जिसे पैसा भुगतान किया गया वह प्रयुक्त सेवाओं अथवा उद्देश्यों के लिए वैधानिक रूप से उपलब्ध था।
(ख) कि खर्च उस प्राधिकार के समानुरुपता में था जो उसका प्रशासन करता है।
(ग) कि प्रत्येक पुनर्विनियोग संबंधित नियमों के अनुसार ही है।