मुगल साम्राज्य के पतन के बाद भारत की परंपरागत शिक्षा प्रणाली तथा शिक्षण संस्थाओं को धक्का लगा। ब्रिटिश कंपनी भारत विजय के बाद अंग्रेजो ने भारत में शिक्षा के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया। कंपनी, भारतीयों को शिक्षित करना अपना कर्तव्य नहीं मानती थी। उस समय निजी शैक्षणिक संस्थाएं ही ज्यादा थी। ये संस्थाएं अनुदान से चलती थी। हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए शिक्षण संस्थाओं में क्रमशः पंडित और मौलवी विद्या दान करते थे।
यद्यपि सरकारी तौर पर कंपनी ने शिक्षा के प्रसार के लिए प्रयास नहीं किए , परन्तु इस समय भी कुछ उदार और विवेकशील अंग्रेजों और इशाई मिशनरियों ने इस दिशा में प्रयास किए। वारेन हेस्टिंग्स ने अपने प्रयासों से 1781 ई० में कलकत्ता मदरसा की स्थापना की , जिसमें अरबी और फारसी की शिक्षा दी जाती है। बाद में हेस्टिंग्स के सहयोग से सर विलियम जोन्स ने 1778 ई० में एशियाटिक सोसायटी और बंगाल की स्थापना की, जिसने प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। शिक्षा के प्रसार से कंपनी के अधिकारी भी शिक्षा के महत्व को समझने लग गए।
उनके दिमाग में यह बात बैठ गई की ब्रिटिश हितों की सुरक्षा के लिए भारतीयों के एक शिक्षित वर्ग को तैयार करना आवश्यक है। जो पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के हिमायती हों। कंपनी द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में वास्तविक प्रयास वर्ष 1813 में प्रारंभ हुआ ।