आर्य समाज और स्वामी दयानंद सरस्वती जी

आर्य समाज की स्थापना1875 ई में स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने किया था। स्वामी दयानंद सरस्वती जी का जन्म1824 ई में (मौरवी, जिला गुजरात) मे हुआ था। इनके बचपन का नाम मूल शंकर था। इन्होंने 21 वर्ष की अवस्था में गृह का परित्याग कर दिया था।

स्वामी पूर्णानंद ने 1848 ई में इनका नाम मूलशंकर से बदलकर स्वामी दयानंद सरस्वती रखा। 1861 ई में इनकी मुलाकात मथुरा में स्वामी बिरजा नंद से हुई।और बिरजा नंद को इन्होंने अपना गुरु बनाया।

स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने अपने गुरू के समक्ष प्रतिज्ञा किया कि  पूरे भारत वर्ष में हिंदू धर्म एवं संस्कृति को प्रतिष्ठित किया जायेगा।

1863 ई में अपने धर्म का प्रचार करने के लिए आगरा में इन्होंने पाखण्ड खण्डनी पताका फहराया। 1875 ई में इन्होंने मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना की।

1877ई में इन्होंने अपना मुख्यालय लाहौर को बनाया। आर्य समाज पंजाब और पश्चिम उत्तर प्रदेश मे सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ।

दयानंद सरस्वती जी ने वेदों की ओर लौट का नारा दिया। दयानंद सरस्वती जी कठोर सुधारवादी थे। इन्होंने छुआछूत जाति व्यवस्था का विरोध किया किन्तु वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया।

स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने सत्यार्थ प्रकाश की महत्वपूर्ण रचना हिंदी भाषा मे किया।

स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने भारतीय समाज को धर्म प्रवर्तन से बचाने के लिए शुद्धि आंदोलन चलाया। जिसके द्वारा ईसाई बन चुके हिन्दुओ को वापस उनकी संस्कृति में लाया जा सके।

स्वामी दयानंद सरस्वती जी ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज शब्द का पहली बार प्रयोग किया।और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।

स्वामी दयानंद सरस्वती जी पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार किया। 1882 ई में इन्होंने गोरक्षा समिति बनाई।

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