'एक देश, एक चुनाव' लोकसभा और विभिन्न राज्यों की विधासभाओं का चुनाव एक साथ करवाने का एक वैचारिक उपक्रम है। प्रत्येक वर्ष देश के किसी-न-किसी राज्य चुनाव की प्रक्रिया चलती रहती है। इस अवधारणा के तहत देश के चुनाव चक्र को इसप्रकार से सुनिश्चित करने का प्रस्ताव है जिसमें लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने के विचार समाहित है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् पूरे देश में लोकसभा के साथ ही राज्य विधानसभाओं के चुनाव कराए जाते थे और यह प्रक्रिया देश के इतिहास में वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गए, लेकिन राज्यो के पुनर्गठन और सरकारों के बर्खास्तगी के कारण धीरे धीरे यह क्रम बिखरता चला गया और वर्ष 1970 आते-आते लोकसभा और विधानसभा के साथ साथ चुनाव कराने की परंपरा पूरी तरह समाप्त हो गई।
पक्ष में तर्क
हमारे देश में चुनाव को लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। अगर हम अपने देश में होने वाले चुनावों पर नजर डालें तो पाते हैं कि प्रत्येक वर्ष किसी-न-किसी राज्य में चुनाव होते रहते है।
चुनावों के इस निरंतरता के कारण देश लगातार चुनावी मोड में बना रहता है, इससे न केवल प्रशासनिक और नीतिगत फैसले प्रभावित होते है, बल्कि देश के वित्तीय व्यवस्था पर भी भारी बोझ पड़ता है। हाल ही में हुए 17वीं लोकसभा चुनाव में एक अनुमान के अनुसार, 60 हजार करोड़ रुपए से अधिक का खर्च आया और लगभग तीन महीने तक देश चुनावी प्रक्रिया में रहा। एक तरफ जहां, 'एक देश, एक चुनाव' से सार्वजनिक धन की बचत होगी, वहीं प्रशासनिक मशीनरी चुनावी गतिविधियों में संलग्न रहने के बजाए विकासात्मक गतिविधियों में लगी रहेंगी।
विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट
वर्ष 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव को एक साथ कराने का समर्थन किया था।
विपक्ष में तर्क
संविधान में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कोई व्यवहारिक कार्यकाल तय नहीं किया गया है। ऐसे में गठबंधन के इस दौर में अगर कोई साथी दल गठजोड़ को अल्पमत में छोड़कर चला जाता है तो उस हालात में क्या होगा ? क्या ऐसी स्थिति में हम सभी राज्यों के विधानसभाओं को भंग करेंगे ? इसलिए यह विचार लोकतंत्र की भावना के खिलाफ लगता है।
हमारे संविधान का मूल ढांचा संघीय है। संविधान में यह कहां गया है कि संघीय ढांचे के अन्तर्गत भारत राज्यों का संघ होगा तथा केन्द्र और राज्यों में शक्ति का विभाजन है। इस तरह का ढांचा सता पर नियंत्रण को सुनिश्चित करता है। ऐसे में विशेष रूप से तब जब केन्द्र और राज्यों में अलग अलग राजनीतिक दलों की सरकारें हो।
आगे की राह
सैद्धांतिक रूप से 'एक देश, एक चुनाव' बहुत ही आकर्षक विचार है, किन्तु राजनीतिक दलों द्वारा जिस तरह से इसका विरोध किया जा रहा है इसे निकट भविष्य में लागू कर पाना संभव नहीं है। देश के विभन्न राजनीतिक दलों की भी इस मुद्दे पर एक राय होनी चाहिए जिससे कि इस प्रक्रिया को लागू करने में कोई अड़चन न आए। अंततः इस पर सभी पक्षों द्वारा व्यापक विचार व विमर्श किए जाने की जरूरत है।