प्रकाशमण्डल : यह सूर्य का धरातल होता है जिसका तापमान 60000C से अधिक होता है। इस सतह से ही सूर्य का प्रकाश फोटॉन के रूप में निकलकर चारों ओर दिशाओं में फैलता है। इसी सतह पर सौर्य कलंक अथवा सौर्य धब्बा पाये जाते है। सौर्य कलंक, सूर्य की सतह पर स्थित वो क्षेत्र होता है जहाँ का तापमान सूर्य की अन्य सतहों के तापमान से लगभग 1500K कम होता है। इस क्षेत्र में ऊर्जा का विकिरण अन्य क्षेत्रों की तुलना में अत्यंत कम मात्रा में होता है। एक सौर्य कलंक का जीवन काल कुछ घण्टों से कुछ माह का ही होता है। सौर कलंक प्रायः जोड़े में होते है जो सूर्य की सतह पर एक दूसरे के विपरीत पाये जाते है।
वर्णमण्डल या क्रोमोस्फीयर : सूर्य के प्रकाश मण्डल को चारों ओर से घेरे आवरण को क्रोमोस्फीयर कहते है। ये सूर्य का वायुमण्डल है जो 2000 से 3000 किमी मोटाई में पाया जाता है। ये वायुमण्डल गर्म गैसों का बना है जिससे होकर विसर्जित होने वाला प्रकाश बाहर निकलता है। कोरोनाग्राग नामक यंत्र के सहयोग से इसका निरीक्षण किया जाता है। सर्वप्रथम 1868 में क्रोमोस्फीयर का स्पेक्ट्रम देखा गया था।
कोरोना : ये सूर्य के वायुमण्डल के चारों ओर विद्यमान एक छल्ले नुमा क्षेत्र है जो चमकीले छल्ले के रूप में चमकता है।