लोकोक्तियाँ-2

लोकोक्तियाँ-2

15

सूत न कपास जुलाहे में लट्ठमलट्ठा

उद्देश्यहीन अकारण झगड़ा

16

एक करेला ऊपर से चढ़ा नील की डार

दुष्ट व्यक्ति का कुसंगति में पड़ना

17

हंसे रहे सो उड़ गये कागा भये दीवान

योग्य व्यक्ति के स्थान पर अयोग्य व्यक्ति द्वारा पद प्राप्त करना

18

कौवा चला हंस की चाल

अयोग्य द्वारा योग्यता का दिखावा

19

बगुला चला हंस की चाल

छद्मवेशी होना

20

घर में नहीं दाने अम्मा चली भूनाने

झूठी शान भरना

21

घड़ी में घर जले ढाई घड़ी भद्रा

प्रत्युत्पन्नमति से संकट दूर कर लेना

22

गरीब की लुगाई गाँव की भौजाई

कमजोर की सम्पत्ति पर सब अपना अधिकार जनाते है।

23

अटका बनिया देय उधार

मजबूरी में दबना पड़ता है

24

घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव की सिद्ध

विद्वान व्यक्ति का अपने घर में महत्त्व नहीं होता है

25

उतर गई लोई क्या करेगा कोई

इज्जत चली जाने पर शोर मचाना व्यर्थ है।

26

हरे सावन भरे भादों

एक समान स्थिति होना

27

नाई की बारात में सब ठाकुर ही ठाकुर

किसी निश्चित अगुआ का न होना

28

नाई के आगे सबको सिर झुकाना पड़ता है

हर आदमी का अपना महत्व होता है

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