मानसून शब्द मौसम से मिलकर बना है तथा अरबी भाषा का शब्द है। अलमसूदी नामक अरबी यात्री ने भारत की तरफ आने वाली मानसूनी हवाओं की खोज की थी। भारतीय कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है।
भारतीय मानसून की प्रकृति-
भारतीय मानसून की प्रकृति को समझने के लिए निम्न तथ्य दिए गए हैं-
1-मानसून का प्रारंभ तथा अग्रसरण
2- वर्षा तंत्र तथा मानसूनी वर्षा का वितरण
3- मानसून में विच्छेद
4- मानसून का निवर्तन
1- मानसून का आरंभ, अग्रसरण या आगे बढ़ना-
19वीं शताब्दी के अंत में यह व्याख्या किया गया था कि गर्मी के महीनों में स्थल तथा समुद्र का विभेदी तापमान मानसून पवनों के उपमहाद्वीप की ओर चलने के लिए मंच तैयार करता है ।अप्रैल और मई के महीने में जब सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है तो हिंद महासागर के उत्तर में स्थित भूखंड अत्यधिक गर्म हो जाता है इसके परिणाम स्वरुप उत्तर-पश्चिम भाग पर एक निम्न दाब क्षेत्र विकसित होता है तथा दक्षिणी गोलार्ध में उच्च वायुदाब क्षेत्र का विकास होता है। इन्हीं दशाओं में अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र आई.टी.सी.जेड उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाता है इसी कारण मानसून का आगमन भारत में होता है। भारत में मानसून का आगमन 1 जून से 7 जून के बीच में केरल के मालाबार तट पर पहुंचता है। भारत में मानसून दक्षिण पश्चिम की ओर से आता है इसी कारण उसे दक्षिण-पश्चिमी मानसून के नाम से जाना जाता है। एशिया सहित भारतीय उपमहाद्वीप में सूर्य की किरणें सीधी पड़ने के कारण निम्न दाब क्षेत्र का विकास होता है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने के कारण तापमान में कमी होती है और उच्च दाब का विकास होता है। जिसके कारण हवाएं उच्च वायु दाब क्षेत्र से निम्न वायु दाब क्षेत्र की ओर चलना प्रारंभ कर देती हैंं। यह मानसूनी हवाएं हिंद महासागर में प्रवेश करते हैं तथा हिंद महासागर में यह दो भागों बट जाती हैं
अ- अरब महासागर की मानसूनी शाखा
ब- बंगाल की खाड़ी शाखा