प्रायद्वीपीय पठार हिमालय पर्वत माला को छोड़कर संपूर्ण भारत में फैला है।
इस पठार में अनेक जलप्रपात मिलते हैं इन जल प्रपातों से विद्युत उत्पादन का कार्य किया जाता है।
इन पठारों के बीच में अनेक प्राकृतिक खंड्या गड्ढे मिलते हैं जिसके कारण तालाबों की अधिकता पाई जाती है जिससे सिंचाई व्यवस्था संभव हो पाती है।
दक्कन के लावा पठार के अपरदन एवं अपक्षय के उपजाऊ काली मिट्टी निर्मित हुई है ।जो कपास सोयाबीन एवं चना की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।
पश्चिमी घाट के अधिक वर्षा वाले समतल उच्च भागों पर लैटेराइट मिट्टी की उत्पत्ति हुई है ।जिन पर मसाला चाय कॉफी इत्यादि की खेती संभव हो पाती है।
प्रायद्वीपीय पठार ों की शेष भागों की लाल मिट्टियों में मोटे अनाज तंबाकू एवं सब्जियों की खेती हो पाती है ।प्रायद्वीपीय पठार के शेष भागों के लाल मिट्टियों पर सदाबहार वन पाए जाते हैं। तथा उन क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा भी होती है यहां सागौन देवदार अब न्यूज़ महोगनी चंदन बांस इत्यादि आर्थिक दृष्टिकोण से उपयोगी वनों की लकड़ियां मिलती हैं।
इस पठार के आंतरिक भागों में कम वर्षा वाले क्षेत्रों में घास वाली भूमि मिलती है। जिसके आधार पर पशुपालन संभव हो पाता है ।प्रायद्वीपीय पठार भारत के खनिज संसाधनों की अधिकांश भाग की पूर्ति करता है।
यहां भूगर्भिक संरचना सोना तांबा लोहा यूरेनियम एवं बाक्साइट कोयला मैगजीन इत्यादि खनिजों में संपन्न हैं छोटा नागपुर झारखंड को पठार की भारत का रूट कहा जाता है क्योंकि यहां पर खनिज संसाधनों की विलुप्त भंडार है इन्हीं खनिज संसाधनों के आधार पर ही विभिन्न खनिज पर आधारित विभिन्न उद्योग धंधों की स्थापना संभव हो सकी है। पठारी बाघों को तटीय भागों पर अनेक झाड़ियां एवं लैगून मिलते हैं जहां बंदरगाहो एवं पोताश्रय का निर्माण हो सका है।