अ- अरब सागर की मानसूनी की शाखा-
यह मानसूनी शाखा दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर प्रवाहित होते हुए पश्चिमी घाट पर्वत माला से टकराती है। पश्चिमी घाट पर्वत की औसत ऊंचाई 900 मीटर है जबकि कुछ चोटियों की ऊंचाई अधिक किंतु दक्षिण से उत्तर की ओर वह क्रमशः घटने लगती है।
इस पश्चिमी घाट पर्वतमाला से टकराने के बाद जलवाष्प युक्त हवाएं ऊपर उठती हैं तथा संघनित वर्षा करती हैं।
ये मानसूनी हवाएं पुणे अर्थात पुना के समीप महाबलेश्वर की चोटी से टकराती हैं तथा सागर के तरफ घनघोर वर्षा करती है वहीं पर पुणे शहर में वृष्टि छाया क्षेत्र (चोटी की परछाई के कारण वर्षा ना होना) का विकास करती हैं। जिसके कारण वहां पर बहुत कम वर्षा होती है।
कुछ हवाएं पश्चिमी घाट के विभिन्न दर्रों से प्रवेश कर मैदानी क्षेत्रों में वर्षा करती हैं यह दर्रा दक्षिण से उत्तर की ओर हैं जो निम्नलिखित हैं-
1- सिनकोटा दर्रा (जो सबसे दक्षिण में है )
2- पालघाट दर्रा
3- तिनियाघाट दर्रा
4- अगुंबे घाट दर्रा
5- भोरघाट दर्रा
6- थाल घाट दर्रा
इन्हीं पठारी दर्रों से पश्चिमी घाट की मानसूनी शाखा मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है तथा मैदानी क्षेत्रों में 60 से 80 सेंटीमीटर तक वर्षा करती है । ताप्ती नदी घाटी में प्रवेश होकर लगभग 150 सेंटीमीटर वर्षा करती है तथा यह वर्षा करते हुए नागपुर पहुंच जाती है। इसी क्षेत्र में बंगाल की खाड़ी की शाखा गोदावरी नदी घाटी से आकर मिल जाती है तथा दोनों टकराकर चक्रवाती वर्षा करती हैं।
अरब सागर की एक शाखा नर्मदा नदी घाटी में प्रवेश कर लगभग 150 सेंटीमीटर वर्षा करते हुए अमरकंटक तक पहुंच जाती है तथा वहां पर सोन नदी घाटी में आई हवाओं से टकराकर वर्षा करती है नर्मदा नदी घाटी में आने वाली मानसूनी शाखा विंध्याचल के दक्षिण ढालों में घनघोर वर्षा करती हैं।
अरब सागर की एक शाखा माही नदी में प्रवेश करते हुए मध्यप्रदेश के मालवा पठार तक पहुंच जाती है तथा मालवा क्षेत्र में 80 से 100 सेंटीमीटर तक वर्षा करती है।
साबरमती की एक शाखा (खंभात की खाड़ी में जो स्थित है) राजस्थान के अरावली पर्वत के गुरु शिखर से टकराकर लगभग 100 सेंटीमीटर तक की वर्षा करती है।
अरब सागर की एक शाखा गुजरात के गिर ,गिरनार, मांडवा की पहाड़ी से टकराकर 150 सेंटीमीटर तक की वर्षा करती है इसी वर्षा के कारण गुजरात के काठियावाड़ तथा गिरनार क्षेत्र में सघन वन पाए जाते हैं।
अरब सागर की काठियावाड़ होते हुए एक शाखा राजस्थान में प्रवेश करती है लेकिन यहां पर अरावली पर्वत के समानांतर होने के कारण अर्थात समान ऊँचाई के कारण ऊपर नहीं उठती तथा राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र से गुजरने के कारण अपनी आर्द्रता को खो देती है क्योंकि मरुस्थल की गर्म किरणें आर्द्रताओं को अवशोषित कर लेती हैं।