सूरवंश ( शेरशाह सूरी) द्वितीय अफगान राजवंश (1540-1555)

इस राजवंश की स्थापना बिलग्राम का युद्ध जीतने के पश्चात शेरशाह सूरी ने किया था।

शेरशाह सूरी का जन्म 1486 ईस्वी पंजाब के नागौर नामक स्थान में हुआ था ।इनका मूल नाम फरीद खान पिता का नाम हसन खान और बाबा का नाम इब्राहिम खान सूर था।

शेरशाह सूरी के दादा इब्राहिम खान सूर घोड़े के व्यापारी थे। जो बहलोल लोदी के शासनकाल में पंजाब के बजवाड़ा नामक स्थान पर बस गए थे। शेरशाह सूरी के पिता हसन खान का हिसार और फिरोजा के जागीरदार जमाल खान सारंग खानी के यहां नौकरी मिल गई थी ।बाद में सिकंदर लोदी ने इसे जौनपुर रियासत का जागीरदार नियुक्त कर दिया था।

हसन खा अपनी चौथी पत्नी और उसके बच्चों से अधिक लगाव रखता था। जिसके कारण उसने फरीद के साथ पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाया जिससे असंतुष्ट होकर फरीद खान जौनपुर चला आया था ।इसी जौनपुर में फरीद खान की शिक्षा-दीक्षा हुई ।इसी समय सेर शाह सूरी अपने पिता के आश्रयदाता जमाल खान का विश्वास पात्र बन गया था। इसी कारण उसने फरीद खान और हसन खान के बीच समझौता कराया था।

शेरशाह सूरी के कुछ प्रमुख आक्रमण।

बंगाल विजय अभियान (1541)

शेरशाह सूरी ने बंगाल में हुए विद्रोह को दमन किया और 19 सरकार या जिला में विभाजित कर दिया तथा यहां पर सिकदार की नियुक्ति की थी ।सिकदार का मतलब आज का DM कहलाता है।

1541 -42 ईस्वी में शेरशाह सूरी ने पाटलिपुत्र शहर को पटना नाम से बसाया था।

मारवाड़ विजय अभियान(1543-44)

शेरशाह सूरी ने मारवाड़ के शासक मालदीव की ओर ध्यान दिया ।जो एक योग्य शासन एवं महत्वाकांक्षी शासक था उसने बीकानेर को जीतकर अपने राज्य में विलय कर लिया था। मालदेव कभी भी दिल्ली और आगरा के लिए संकट उत्पन्न कर सकता था। इसलिए इस राज्य को जीतना अति आवश्यक था ।शेरशाह ने मारवाड़ को कई महीनों घेरे रखा। लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी इसलिए उसने जाली पत्र बटवा कर सामंतों को मालदेव के विरुद्ध खड़ा कर दिया। जिसके कारण मालदेव गुजरात भाग निकला इसी समय से सा सूरी ने कहा कि मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान का साम्राज्य खोने के लिए चला था।

कालिंजर अभियान(1545)

यह शेरशाह सूरी का अंतिम विजय अभियान था ।कालिंजर का किला बुंदेलखंड के बांदा जिला में स्थित है यहां का शासक कृति विजय सिंह या कीरत सिंह चंदेल था। शेर शाह सूरी इस राज्य को जीतने के लिए 1544 में कालिंजर पहुंचा था।

उसने कई महीना तक कालिंजर के किले को घेर रखा लेकिन उसे सफलता हासिल नहीं हुई ।इसी समय उसने अपने सैनिकों को कालिंजर के किले उड़ा देने की आज्ञा जारी किया।

शेरशाह सूरी स्वयं उक्का नामक अग्नि अस्त्र लेकर कालिंजर को तोड़ने लगा ।इसी समय एक गोला कालिंजर के दीवारों से टकराकर शेरशाह के पास आकर फट गया। जिससे शेरशाह बुरी तरह से झुलस गया। इसके कारण उससे मरते-मरते कालिंजर को जीतना चाहता था। इसी कालिंजर में विजय की सूचना पाते ही शेर शाह यहां से विदा हो गया। शेरशाह सूरी को रोहतास के सासाराम स्थित मकबरा में दफनाया गया जिसे शेरशाह सूरी का मकबरा कहा जाता है।

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