भू-कंप और ज्वालामुखी से महासागरीय धरातल में अचानक हलचल पैदा होती है और महासागरीय जल का विस्थापन हो जाता है ।परिणाम स्वरुप ऊर्ध्वाधर तरंगें पैदा होती हैं। जिन्हें सुनामी कहा जाता है। सुनामी को भू- कम्पीय समुद्री लहरें भी कहा जाता है।
शुरू में सिर्फ एक ही ऊर्ध्वाधर तरंग ही पैदा होती है लेकिन धीरे-धीरे यह श्रंखलाओं में बनते जाते हैं। जिसके कारण जल तेज गति से किनारों की ओर चलने लगते हैं जिन्हें सुनामी कहा जाता है। महासागर में जल तरंगों की गति जल की गहराई पर निर्भर करती है। इसकी गति उथले समुद्र में ज्यादा एवं गहरे समुद्र में कम होती है। परिणाम स्वरुप महासागरों के अंदरूनी भाग कम प्रभावित होते हैं तटीय क्षेत्रों में यह तरंगे ज्यादा प्रभावित होती हैं तथा व्यापक नुकसान पहुंचाती हैं।
इसीलिए समुद्री क्षेत्र में जलपोत पर सुनामी का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात गहरे क्षेत्र में सुनामी महसूस भी नहीं होती है। जबकि इसके विपरीत सुनामी किनारों पर प्रवेश होती है तब तरंग की लंबाई कम हो जाती है समय कम रहता है और तरंग की ऊंचाई बढ़ती जाती है कई बार तो इसकी ऊंचाई 15 मीटर या इससे अधिक हो सकती है जिससे तटीय क्षेत्रों में भीषण विध्वंस होता है।
विश्व में सबसे अधिक सुनामी प्रशांत महासागर में आते हैं जिसके कारण अलास्का, जापान, फिलीपींस, दक्षिण पूर्व एशिया के दूसरे द्वीप, इण्डोनेशिया, मलेशिया इत्यादि क्षेत्रों में इसके प्रभाव देखे जाते हैं।
हिंद महासागर में म्यांमार, श्रीलंका तथा भारत के तटीय भागों में सुनामी के प्रभाव देखे जाते हैं ।26 दिसंबर 2004 को भारत में सुनामी की लहरें आई थी जिसमें सबसे अधिक तमिलनाडु का कोरोमंडल तट प्रभावित हुआ था। भारत की दक्षिणी बिंदु इंदिरा पॉइंट 2004 के सुनामी में जल समाधि ले लिया था। भारत में पूर्व सुनामी चेतावनी केंद्र की स्थापना हैदराबाद में हुई । पूर्व सुनामी चेतावनी केंद्र के द्वारा 20 से 24 घंटे पहले या कम से कम 8 घंटा पहले सुनामी की चेतावनी दी जा सकती है।