लोकोक्तियाँ-6

लोकोक्तियाँ-6

आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास

करने को कुछ आये और करने लगे कुछ और

इतनी सी जान, गज भर की जबान

छोटा होना पर बढ़ चढ़कर बोलना

ईंट का जवाब पत्थर

दुष्ट के साथ दुष्टता करना

इस हाथ दे, उस हाथ ले

कर्मों का फल शीघ्र पाना

ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया

कहीं सुख, कहीं दुःख

उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे

अपराधी ही पकड़ने वाले को डाँट लगाये

उद्योगिनं पुरुषसिंहनुपैति लक्ष्मी

उद्योगी को ही धन मिलता है।

ऊपर-ऊपर बाबाजी, भीतर दागाबाजी

बाहर से अच्छा भीतर से बुरा।

ऊँची दूकान फीका पकवान

बाहर ढकोसला भीतर कुछ नहीं

ऊँचे चढ़ के देखा, तो घर-घर एकै लेखा

सभी एक समान

ऊँट किस करवट बैठता है

किसकी जीत होती है।

ऊँट के मुँह में जीरा

जरूरत से बहुत कम

ऊँट बहे और गदहा पूछे कितना पानी

जहाँ बड़ों का ठिकाना नहीं, वहाँ छोटो का क्या कहना

ऊधों का लेना न माधो का देना

लटपट से अलग रहना

एक पंथ दो काज

एक नहीं दो लाभ

एक तो करेला आप तीता दूजे नीम चढ़ा

बुरे का और बुरे संग होना

अनार सौ बीमार

एक वस्तु को सभी चाहने वाले

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