लोकोक्तियाँ-7

लोकोक्तियाँ-7

एक तो चोरी दूसरे सीनाजोरी

दोष करके न मानना

एक म्यान में दो तलवार

एक स्थान पर दो उग्र विचार वाले

ओछे की प्रीत बालू की भीत

नीचों का प्रेम क्षणिक

ओस चाटने से प्यास नहीं बूझती

अधिक कंजूसी से काम नहीं चलता

कबीरदास की उलटी बानी, बरसे कम्बल भींगे पानी

प्रकृतिविरूद्ध काम

कहाँ राज भोज, कहाँ भोजवा (गंगू) तेली

छोटे का बड़े के साथ मिलान करना

कहे खेत की, सुने खलिहान की

हुक्म कुछ और करना कुछ और

कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा

इधर-उधर से सामान जुटाकर काम करना

काला अक्षर भैंस बराबर

निरा अनपढ़

काबुल में क्या गदहे नहीं होते

अच्छे-बुरे सभी जगह है

का वर्षा जब कृषि सुखाने

मौका बीत जाने पर कार्य करना व्यर्थ है

काठ की हाँड़ी दूसरी बार नहीं चढ़ती

कपट का फल अच्छा नहीं होता

किसी का घर जले, कोई तापे

दूसरे का दुःख में देखकर अपने को सुखी मानना

खरी मजूरी चोखा काम

अच्छे मुआवजे में ही अच्छा फल होना

खोदा पहाड़ निकली चुहिया

कठिन परिश्रम थोड़ा लाभ

खेत खाये गदहा, मार खाये जोलहा

अपराध करे कोई, दण्ड मिले किसी और को

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