भारत में चुनाव सुधार

आजादी के बाद भारत में जब पहले आम चुनाव संपन्न हुए तब देश की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा निरक्षर था और करीब 5:30 सौ रजवाड़ों की प्रजा को किसी भी तरह की जनतांत्रिक प्रणाली में भागीदार का अनुभव नहीं था

पहले दो आम  चुनाव में आजादी की लड़ाई महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़ने वाली कांग्रेस पार्टी बहुत बड़ा बहुमत मिला था 

पीपुल्स रिप्रजेंटेशन एक्ट सभी वयस्क नागरिकों को सार्वजनिक मताधिकार से संपन्न करता है और यह निर्देश देता है कि जन प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचन के लिए उम्मीदवारों की क्या अहर्ता होनी चाहिए और चुनावी प्रक्रिया के शब्द का पालन के अभाव में कैसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है

भारत ने जो संसदीय प्रणाली अपनाई है वह ब्रिटेन के वेस्टमिनिस्टर वाली है 

1960 के दशक के मध्य तक भारत की राजनीति में एक ही राजनीतिक दल का वर्चस्व रहा

रजनी कोठारी ने इसे सिंगल पार्टी डमिनेंस का नाम दिया था

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी का मानना है कि चुनाव में काले धन पर रोक लगाने का एकमात्र उपाय सभी प्रत्याशियों के चुनाव का खर्च सरकार द्वारा उठाने की व्यवस्था है

ऐसा करने के लिए मौजूदा कानूनों में तथा संवैधानिक व्यवस्था में संशोधन आवश्यक है

चुनाव प्रणाली में सुधारों के लिए समय-समय पर गठित तारकुंडे 1975 गोस्वामी 1990 तथा इंद्रजीत गुप्ता 1998 वाली अध्यक्षता वाली समितियों तथा चुनाव आयोग की सिफारिशों 1998 के बावजूद इस समस्या का समाधान नहीं ढूंढा जा सका है

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