भारतीय कृषि पूरी तरह मानसून पर निर्भर है और किसी का सबसे ज्यादा नुकसान तब होता है जब उसको उत्पादन के बाद उसको सही तरह से दाम नहीं मिल पाते हैं भारत में आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी क्रय केंद्रों पर अनाज की खरीद बढ़ाई जाए ताकि किसानों को सही प्रकार से दाम मिल सके
कृषि विपणन नीति में आमूलचूल सुधार किया जाए ताकि किसान सीधे उपभोक्ताओं के करीब पहुंच सके
बिचौलियों की भूमिका कम होनी चाहिए
परंपरागत रूप से सारा दोष स्थानीय साहूकारों पर डाला जा रहा है जिसमें ऐसा कहना है कि साहूकार ब्याज दरों को मनमाने ढंग से बढ़ाते जा रहे हैं जिससे गरीब किसानों की स्थिति काफी दयनीय हो जाती है एनसीआरबी के डाटा के अनुसार वर्ष 2015 में 3000 किसानों में से 2474 किसानों ने आत्महत्या कर ली जिसमें आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इनमें से केवल 9.8 प्रतिशत ही ऐसे किसान थे जिन्होंने साहूकारों से ब्याज पर उधार लिया था जबकि शेष किसानों ने स्थानीय बैंकों से उधार लिया था इसके अलावा कुछ अन्य आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में 12 से 93 किसानों ने आत्महत्या की थी
भारत में सरकार को चाहिए कि वह स्थानीय उर्वरक उद्योग का समर्थन करें जिसमें समय-समय पर सब्सिडी का वितरण सबसे उपयोगी साबित होगा क्योंकि अगर भुगतान में देरी की गई तो रो-रो कंपनियों को 33 100 करोड रुपए की ब्याज खर्च का सामना करना पड़ सकता है इसके अलावा सिस्टेमेटिक राइस इंटर्नशिप फिकेशन जैसी सशक्त कृषि तकनीक का उपयोग करने से बीज उत्पादन में काफी बढ़ोतरी होगी हमें हमारे खेत उपकरण नीति पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है