तेलंगाना कृषक आंदोलन

तेलंगाना क्षेत्र में पटेल और पटवारियों की सहायता से देशमुखों ने अच्छी जमीन के अधिक से अधिक भाग पर कब्जा करके उसे  अधिक से अधिक  लगान पर उठाना शुरू कर दिया। 1940 तक उनके पास कुछ जिलों में तो 60से70 प्रतिशत भूमि पे कब्जा हो गया था। कई बार एक एक देशमुख के पास चालीस हजार से एक लाख अथवा डेढ़ लाख एकड़ तक भूमि हो गई । इन देशमुखों और जमींदारो को निज़ाम की सरकार  संरक्षड प्राप्त था। किसानों ने और खेतिहरों ने जिनका भरपूर परेशान किया जा रहा था । अपना आंदोलन क्षेड दिया। धीरे धीरे सिथानिय कम्युनिटी मझौले किशान और कांग्रेस संगठन भी आंदोलन। में सामिल हो गया। राज़ाकरो ने पुलिस  साथ दिया । विद्रोह की चिंगारी किसानों के नेता कामरेड की हत्या से प्रारंभ हुई और भयानक  आग के रूप में परिवर्तित हो गई। उनके शव को  कर जब किसानों ने जुलूस निकाला तो पुलिस और राजकारो ने निहारते फिर किसानो पर आक्रमण कर दिया। किसानो ने ईट पत्थर से जवाब दिया। विद्रोह कर के कई स्थानों पर अपना अधिकार कर लिया। उन क्षेत्रों में निज़ाम का प्रशासन समाप्त हो गया । जमींदार को भगा  दिया गया । भूमि को किसानो और खेतिहरों मजदूर को बांट दिया गया।जुलाई 1948 में गुरिल्लाओ और कम्युनिटी  के प्रभाव  लगभग पच्चीस हजार बस्ती आ चुके थे।
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