लौकिक साहित्य-
पाणिनी की अष्टाध्यायी है। इसमें मौर्य युग से पूर्व भारत की सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक दशा की कुछ जानकारी मिलती है।
चाणक्य या विष्णुगुप्त या कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनेक सिद्धान्तों को 7वीं-8वीं शताब्दी ई0 में कामन्दक ने अपने नीतिशास्त्र में संकलित किया।
विशाखदत्त के मुद्राराक्षस, सोमदेव के कथासारित्सागर और क्षेमेन्द्र की वृहत्कथामंजरी से मौर्यकाल की कुछ घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है।
सोमदेवसूरि की नीतिवाक्यमृत (10 शताब्दी के अन्त) अर्थशास्त्र की कोटि का ग्रन्थ है।
पतंजलि के महाभाष्य एवं कालिदास के मालविकाग्निमित्र से शंुग वंश के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।
कालिदास के रघुवंश में संभवतः समुद्रगुप्त की दिग्विजय की झलक मिलती है।
गुप्तकाल के बाद का इतिहास, राजकवियों द्वारा लिखित अपने संरक्षकों के जीवनचरित है। इनमें प्रमुख है-वाणभट्ट कृत हर्षचरित, वाक्पति ने गौड़वहों में कन्नौज के शासक यशोवर्मा की, विल्हण ने विक्रमांकदेव चरित में कल्याणी के शासक विक्रमादित्य षष्ठ की उपलब्धियों का वर्णन किया है।
इसके अतिरिक्त संध्याकर नन्दी ने रामचरित में बंगाल के शासक रामपाल की, जयसिंह ने कुमारपाल चरित में और हेमचन्द्र ने द्वयाश्रय काव्य में गुजरात के शासक कुमार पाल का, पद्मगुप्त ने नवसाहसांक चरित में परमार वंश सिन्धुराज और जयानक ने पृथ्वीराज विजय में पृथ्वीराज चैहान की उपलब्धियों का उल्लेख किया है।
-शेष अगले भाग में