ईक्ष्वाकु वंश.के शासक प्रारम्भ मे सातवाहनो के सीमान्त थे। किन्तु उसके पतन के बाद ईक्ष्वाकुओं ने अपनी स्वतन्त्रता कि घोषणा कर दी।
इस वंश का संस्थापक श्रीशान्तमूल था। इसका शासन कृष्णा-गुण्टूर क्षेत्र में स्थापित था इसने अश्वमेघ यज्ञ करवाया था। तथा वैदिक काल का अनुयायी था।
श्रीशान्तमूल का पुत्र माठरीपुत्र वीरपुरुषदत्त उसका उत्तराधिकारी बना दिया गया। इसने 20 वर्षो तक शासन किया। अमरावती तथा नागार्जुनीकोण्ड से उसके लेख मिलते हैं। इनमे बौध्द संस्थाओं को दिये जाने का विवरण है।
वीरपुरुषदत्त का पुत्र तथा उत्तराधिकारी शान्तमूल द्वितीय हुआ। इसने 11 वर्षो तक शासन किया। इसके बाद ईक्ष्वाकु वंश के सत्ता का लोप हो गया।
पुराणों मे ईक्ष्वाकु वंश को श्रीपर्वतीय ( श्री पर्वत का शासक) तथा आन्ध्रोमृतीय (आन्ध्रो का नौकर ) कहा गया हैं। कालान्तर मे पल्लवों ने इनके राज्य को ग्रहण कर लिया।