सिन्धु सभ्यता के लोग संभवतः व्यापार वस्तु विनिमय के माध्यम से करते थे।
कोटदीजी का विनाश दो भयंकर अग्निकाण्ड से हुआ था।
विदेशी व्यापार
ताँबा - खेतड़ी, ब्लूचिस्तान
चाँदी - अफगानिस्तान, ईरान
सोना - कर्नाटक, अफगानिस्तान, ईरान
टिन - अफगानिस्तान
लाजवर्द - बदक्शाँ
इस प्रकार सिन्धु वासी विभिन्न देशों से व्यापार करते थे।
वृक्ष पूजा एवं शिवपूजा के प्रचलन के भी साक्ष्य मिलते है।
मनके बनाने के कारखाने लोथल एंव चन्हूदड़ों से प्राप्त हुये है।
मुहरें सर्वाधिक सेलखड़ी की थी।
कोटदीजी से वाणाग्र मिला है।
हड़प्पा सभ्यता के लोगों को लिपि का ज्ञान था किन्तु इसे अभी तक पढ़ा नही जा सका।
मेहरगढ़, पुरास्थल से कपास पायी गयी है। यह विश्व में कपास के अस्तित्व का प्राचीनतम साक्ष्य है। कपास सैन्धव लोगों की मूल फसल थी। इसी कारण यूनानी सिन्ध क्षेत्र को सिण्डन कहने लगे।
मेसोपोटामिया और सिन्धु सभ्यता के बीच व्यापार के अभिलेखीय साक्ष्य भी प्राप्त होते है। सारगोन (2371-2316 ई0पू0) के काल प्राप्त अभिलेखों से ज्ञात होता है कि मेसोपोटामिया का मेलुहा, (हड़प्पा सभ्यता), दिलमुन (बहरीन) और मगन से व्यापारिक सम्बन्ध था। अभिलेख में दिलमुन को सूर्योदय का क्षेत्र या साफ सुथरे नगरों का स्थान तथा हाथियों का देश कहा गया है।
-शेष अगले भाग में