महासागरो मैं लवडता का वितरण

प्रकृति में उपस्थित सभी जल में खनिज लवण घुले हुए होते हैं। लवणता वह शब्द है जिसका उपयोग समुद्री जल में घुले हुए नमक की मात्रा को निर्धरित करने में किया जाता है , इसका परिकलन 1,000 gram (1 Kg)  समुद्री जल में घुले हुए नमक (ग्राम में) की मात्रा के द्वारा किया जाता है। इसे प्रायः प्रति 1,000 भाग (%0) PPT के रूप में व्यक्त किया जाता है। लवणता समुद्री जल का महत्वपूर्ण गुण है। २४.७पर्सेंट की लवणता को खारे जल को सीमांकित करने का उच्च सीमा माना गया है।

खारेपन का कारण - महासागरीय लवणता का मुख्य स्रोत स्वयं पृथ्वी ही है । जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था, तो उसके ठोस सतह पर लवण का अनुपात बहुत अधिक था । बाद में इस सतह का क्षरण होने के कारण ये लवण सागर में पहुँच गये । इसके अतिरिक्त समुद्री जल को खारा बनाने में निम्न कारकों का योगदान है -समुद्र के खारेपन पर उसमें मिलने वाली नदियों का भी योगदान है । जिस महासागर में नदियाँ अधिक मिलती हैं, वहाँ सामान्यतः खारापन कम पाया जाता है, क्योंकि नदियों का जल अपेक्षाकृत कम खारा होता है। जो समुद्र के जल के खारेपन को कम कर देते हैं । उदाहरण के लिए लाल सागर में कोई भी नदी नहीं मिलती । वहाँ का खारापन 40 से 42 प्रति हजार है, जबकि काला सागर में अनेक नदियाँ गिरती हैं, इसलिए वहाँ का खारापन 17-18 प्रति हजार है ।जबकि ठीक इसके विपरीत उन झीलों और सागरों का खारापन बहुत अधिक है, जिन्हें अपने में मिलने वाली नदियों से लगातार नमक प्राप्त होता रहता है । इनका संकट यह होता है कि इनमें वाष्पन की प्रक्रिया से नमक की मात्रा बढ़ जाती है । लेकिन वाष्पन के अनुपात में शुद्ध जल प्राप्त नहीं हो पाता । मृत सागर एक ऐसी ही झील है, जिसमें लवणता की मात्रा 240 प्रति हजार । 

महासागरो पर सबसे अधिक लवड़ता कर्क रेखा तथा मकर रेखा पर पायी जाती है भूमध्य रेखा तथा ध्रुवों पर लवड़ता की मात्रा कम पायी जाती है ।

सागर में स्थित जल का भार तथा उस जल में घुले हुए विभिन्न पदार्थों के भार के अनुपात को सागरीय लवणता कहते हैं। लवणता को ग्राम-प्रति हजार ग्राम में दर्शाया जाता है जिसके लिए अनेको प्रकार के चिन्हो का प्रयोग किया जाता है।


     
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