किस्से, कानूनी दांवपेंच और इतिहास: जानिए क्या था राज नारायण-इंदिरा गाँधी मामला? -2


अदालत के समक्ष मुद्दे- अदालत के समक्ष इंदिरा गाँधी से सम्बंधित मुख्य मुद्दे/आरोप थे -

                   यशपाल कपूर पर इंदिरा गाँधी की ओर से स्वामी अद्वैतानंद (रायबरेली से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले एक अन्य प्रत्याशी) को रिश्वत देना, इंदिरा गाँधी की ओर से चुनाव से पहले रजाई, कंबल, धोती, शराब आदि का वितरण करना, मतदान केंद्रों से मतदाताओं को लाना ले जाना और चुनावी व्यय सीमा (जोकि उस वक़्त 35,000 रूपये था) से अधिक खर्च करना। इसके अलावा, एक प्रमुख मुद्दा, स्वयं यशपाल कपूर से जुड़ा था। दरअसल, इंदिरा गाँधी पर यह आरोप था कि उन्होंने यशपाल कपूर की सेवाओं का उपयोग किया था, जबकि वे अभी भी सरकार के एक राजपत्रित अधिकारी थे। यही नहीं, यह भी आरोप था कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों के लिए बैरिकेड्स लगाने में, अपने भाषणों के लिए शामियाने (रोस्त्रम) का निर्माण करने में और वायु सेना के विमानों में उड़ान भरकर अपने चुनाव जीतने की संभावनाओं को प्रगाढ़ करने के लिए कई राजपत्रित अधिकारियों, सशस्त्र बलों और पुलिस बलों के सदस्यों की सहायता प्राप्त की थी; और उनका चुनाव चिन्ह (गाय और बछड़ा) एक धार्मिक प्रतीक था। गौरतलब है कि मतपत्रों के साथ रासायनिक हेर-फेर के आरोपों को छोड़कर, ऊपर बताये गए सभी आधार, चुनाव कानूनों के तहत, भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practices) के तहत आते थे और यदि एक उम्मीदवार के खिलाफ भ्रष्ट आचरण साबित हो जाता है, तो उसका चुनाव शून्य घोषित कर दिया जाता है और उसे किसी भी सार्वजनिक पद को ग्रहण करने के लिए छह साल के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
                  गौरतलब है कि, राजनारायण ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता, जगदीश प्रसाद गोयल से भी संपर्क किया था, और श्री गोयल अपनी किताब में जिक्र करते हैं कि उन्होंने ही इस मामले के लिए जाने माने अधिवक्ता शांति भूषण का नाम राज नारायण को सुझाया था। इसके अलावा, याचिका का शुरूआती ड्राफ्ट, लखनऊ के एक अधिवक्ता श्री बी. सोलोमन द्वारा तैयार किया गया था।

               27 दिसंबर 1970 या 01 फरवरी, 1971: इंदिरा गाँधी कब बनी लोकसभा उम्मीदवार?

            यह याचिका 24 अप्रैल 1971 की रात अतिरिक्त रजिस्ट्रार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई। गौरतलब है कि, चुनाव याचिका दायर करने की वह अंतिम तारीख थी। याचिका को जस्टिस डब्ल्यू ब्रूम के समक्ष सूचीबद्ध किया गया था। उन्होंने पहली प्रतिवादी, श्रीमती गांधी और दूसरे प्रतिवादी, स्वामी अद्वैतानंद (जो रायबरेली से निर्दलीय चुनाव लडे थे) को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। इसके पश्च्यात, प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी का लिखित जवाब आया जिसमे उन्होंने उनके खिलाफ दाखिल याचिका के सभी अभिकथनों (आरोपों के रूप में) को नकार दिया। इसके पश्च्यात, इस केस से सम्बंधित तमाम ऐसी घटनाएँ घटीं, जिनके विषय में इस लेख में चर्चा नहीं की जा सकती है। कुछ पहलुओं पर मामला सुप्रीम कोर्ट भी गया। बीच में 2 न्यायाधीश रिटायर भी हो गए और अंततः यह मामला न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा के समक्ष वर्ष 1974 में आया। वर्ष 1971 से वर्ष 1974 तक इस मामले में कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई। हालांकि, जैसे ही न्यायमूर्ति सिन्हा के समक्ष यह मामला आया, उन्होंने इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण अपनी किताब में यह कहते हैं कि यदि न्यायमूर्ति सिन्हा नहीं होते, तो यह मामला उच्च न्यायालय में वर्षों तक खिंच सकता था। अब यदि राजनारायण की हाईकोर्ट में दाखिल की गयी याचिका पर गौर किया जाए तो यह साफ़ हो जाता है कि अधिवक्ता शांति भूषण का जोर इस बात पर था कि किसी प्रकार से यह साबित किया जा सके कि श्रीमती गांधी, 27 दिसंबर 1970 से (जब लोकसभा भंग हो गई थी) स्वयं को लोकसभा उम्मीदवार के रूप में जनता के सामने प्रकट कर रही थीं, और उसी समय से यशपाल कपूर उनके लिए चुनाव कार्य करना शुरू कर चुके थे। हालाँकि, श्रीमती गाँधी की ओर से लगातार यह कहा जा रहा था कि वे 01 फरवरी, 1971 को अधिकारिक रूप से लोकसभा उम्मीदवार बनी थीं। दोनों पक्षों द्वारा विभिन्न तारीखों (27 दिसंबर एवं 01 फरवरी) पर इसलिए अदलात में जोर दिया जा रहा था क्योंकि आम तौर पर एक व्यक्ति, उम्मीदवार बनने के बाद ही लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practices) के आरोपों को आकर्षित कर सकता है, अर्थात उम्मीदवार बनने के बाद ही वह जो कार्य करता है उसे उसके दोष के रूप में देखा जा सकता है। [यहाँ पाठक इस बात पर ध्यान दें कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, एक व्यक्ति चुनावी उम्मीदवार तब बन जाता है, जब वह खुद को उम्मीदवार के रूप में सामाजिक रूप से प्रकट करना शुरू कर देता है।]

   अदालत के समक्ष पेचीदा सवाल

                          अदालत के समक्ष कुछ पेचीदा सवाल थे (जिनके आधार पर अंततः प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के खिलाफ फैसला आया) – (1) क्या यशपाल कपूर की सेवाएं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा ली गयी जबकि वे राजपत्रित अधिकारी थे? (2) क्या प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, 1 फरवरी 1971 से पहले किसी भी तारीख से, एक लोकसभा उम्मीदवार के रूप में खुद को सामाजिक रूप से प्रकट कर रही थी और यदि हां, तो किस तारीख से? एवं; (3) क्या यशपाल कपूर 14 जनवरी 1971 और उसके बाद से और किस तारीख तक भारत सरकार की सेवा में बने रहे? गौरतलब है कि यशपाल कपूर की भारत सरकार में एक राजपत्रित अधिकारी के तौर पर सेवा कब खत्म हुई, यह प्रश्न इसलिए महतवपूर्ण है क्योंकि यशपाल कपूर की ओर से अदालत में यह दलील दी गयी थी कि उन्होंने 13 जनवरी 1971 को अपना इस्तीफा दे दिया था और इसे श्री पी. एन. हकसर (प्रधान मंत्री के प्रधान सचिव) द्वारा सीधे तौर पर मौखिक रूप से स्वीकार कर लिया गया था। हालाँकि, यह तथ्य भी सामने आया कि आधिकारिक रूप से यशपाल कपूर का इस्तीफ़ा, राष्ट्रपति ने 25 जनवरी 1971 को स्वीकार किया था, लेकिन इसे 14 जनवरी 1971 के प्रभाव से स्वीकार किया गया था। यहाँ पाठक इस बात पर गौर करें कि आम तौर पर एक सरकारी कर्मचारी की सेवाओं को उस तिथि से समाप्त माना जाता है जिस तिथि से उचित प्राधिकारी द्वारा उसके त्याग पत्र को स्वीकार किया जाता है। अब चूंकि इस मामले में यशपाल कपूर का इस्तीफ़ा 25 जनवरी को स्वीकार किया गया था, इसलिए, इस्तीफा 14 जनवरी से पूर्वव्यापी प्रभाव से प्रभावी होगा या नहीं, इस बात को आसानी से नहीं कहा जा सकता था। इसलिए इस बात का परिक्षण करना भी अदालत के लिए महत्वपूर्ण था। अदालत ने अंततः यह अभिनिर्णित किया था कि चूँकि यशपाल कपूर के इस्तीफे को स्वीकार करने का आदेश 25 जनवरी 1971 को पारित किया गया था, इसलिए यह माना जायेगा कि वे उस आदेश की तारिख तक वे एक राजपत्रित अधिकारी थे। हालाँकि, अदालत में मामले की कार्यवाही के दौरान श्रीमती गांधी के वकीलों द्वारा लगातार यह दलील दी गयी थी कि यशपाल कपूर ने श्रीमती गाँधी के चुनावी अभियान का काम करने से पहले ही अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया था (भले ही इसे औपचारिक रूप से बाद में स्वीकार किया गया हो)। उनकी यह भी दलील थी कि यह बात मायने भी नहीं रखती कि उनका इस्तीफ़ा 13 जनवरी से प्रभावी होगा या 25 जनवरी से, क्योंकि श्रीमती गांधी तो 1 फरवरी (वह दिन जिस दिन उनकी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा हुई) से पहले एक उम्मीदवार बनीं ही नहीं थी। और इसलिए, कानून की शर्तों के तहत, इस तारीख से पहले उनपर भ्रष्ट आचरण के आरोप लगाये ही नहीं जा सकते हैं। हालाँकि, जैसा कि हमने पहले समझा, राज नारायण का यह कहना था कि इंदिरा गाँधी, 27 दिसंबर 1970 से (जब लोकसभा भंग हो गई थी) स्वयं को लोकसभा उम्मीदवार के रूप में जनता के सामने प्रकट कर रही थीं। जैसा कि साफ़ है, इंदिरा गाँधी किस तारिख से स्वयं को उम्मीदवार के तौर पर प्रकट कर रही थीं, यह इस मामले के लिए सबसे अहम् सवाल था और इसी पेचीदा मसले को अदालत ने अपने निर्णय में सुलझाया, जिसे हम आगे समझेंगे.

 जब प्रधानमंत्री स्वयं अदालत में आयीं:

                       कुछ वाकये यह एक आम और गलत धारणा है कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अदालत के समक्ष साक्ष्य देने के लिए हाईकोर्ट द्वारा बुलाया गया था। वास्तव में, सत्य यह है कि उन्होंने अपनी मर्जी से और अपने वकीलों की सलाह पर गवाह के रूप में पेश होने का फैसला किया था। उस दिन अदालत में उपस्थित लोगों में श्रीमती गांधी के पुत्र, राजीव गांधी और उनकी पत्नी, सोनिया गांधी भी शामिल थे। उनके क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान एक दिलचस्प वाकया सामने आया, दरअसल उनके सामने जब वह लिखित बयान रखा गया, जिसमे यह साफ़ दिख रहा था कि उनके निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित अंतिम निर्णय की घोषणा 29 जनवरी 1971 को एआईसीसी द्वारा की गई थी (जबकि वह लगातार कह रही थी कि इस सम्बन्ध में निर्णय 1 फरवरी 1971 को लिया गया था), तो उन्होंने कहा कि इस लिखित बयान को कानूनी भाषा में ड्राफ्ट किया गया था, जिसे समझने में उन्हें कठिनाई हुई थी। ऐसा कहकर वह यह दर्शाना चाहती थीं कि वे अपने निर्वाचन के सम्बन्ध में अंतिम निर्णय की एआईसीसी की दिनांक 29 जनवरी 1971 की घोषणा को समझ नहीं पायीं, क्योंकि वह कानूनी भाषा में लिखित बयान था, जिसपर उन्होंने हस्ताक्षर किये। परिणामस्वरूप, अगले दिन अख़बार की सुर्खियाँ बनी – "प्रधानमंत्री कानूनी भाषा समझ नहीं पातीं" (PM cannot follow legal language) एक अन्य वाकये में, प्रधानमंत्री के क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान, भूषण यह साबित करना चाह रहे थे कि लोकसभा भंग होने के 2 दिन बाद, 29 दिसंबर 1970 को प्रधानमंत्री स्पष्ट रूप से खुद को उम्मीदवार के रूप में प्रकट कर रही थी और यह उस तिथि को संवाददाता सम्मेलन में उनसे पूछे गए एक प्रश्न के उनके उत्तर से स्पष्ट था। दरअसल, एक रिपोर्टर ने उस दौरान उनसे पूछा था, "कुछ घंटे पहले विपक्षी नेताओं की एक बैठक हुई थी और उन्होंने कहा था कि प्रधान मंत्री अपने निर्वाचन क्षेत्र को रायबरेली से बदलकर गुड़गांव कर रही हैं।" इसपर, श्रीमती गांधी ने रिपोर्टर को जोरदार जवाब देते हुए कहा था, "नहीं, मैं ऐसा नहीं कर रही हूं।" इस जवाब को लेकर अपनी बात को समझाते हुए और अपना बचाव करते हुए तब श्रीमती गांधी ने अदालत के सामने कहा था कि उनके उस बयान का मतलब था कि वह गुड़गांव से चुनाव नहीं लड़ेंगी। उन्होंने आगे कहा कि उनकी बात का यह मतलब नहीं था कि वह रायबरेली से चुनाव लड़ेंगी। वो अपने क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान पूरी तरह से इस बात पर कायम रहीं कि उन्होंने 1 फरवरी 1971 से पहले अपने निर्वाचन क्षेत्र पर कोई निर्णय नहीं लिया था और स्वयं को लोकसभा के उम्मीदवार के तौर पर प्रकट नहीं किया था और इसलिए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practices) के तहत आरोप, केवल 1 फरवरी 1971 के बाद के उनके कृत्यों से सम्बंधित हो सकते हैं (यदि यह दलील अदालत द्वारा स्वीकार ली जाती तो यशपाल कपूर के इस्तेमाल के आरोपों से इंदिरा गाँधी शायद बच सकती थीं)।

  अदालत का अंतिम निर्णय

                        12 जून 1975 को मामले में अंतिम निर्णय सुनाते हुए, जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा राजनारायण की याचिका को 2 आधार पर अनुमति दी गई। पहला यह कि प्रधानमंत्री ने, प्रधानमंत्री सचिवालय में विशेष ड्यूटी पर एक अधिकारी, यशपाल कपूर का इस्तेमाल किया था, ताकि उनकी चुनावी संभावनाओं को आगे बढ़ाया जा सके। निर्णय में यह कहा गया कि यद्यपि कपूर ने 7 जनवरी 1971 को इंदिरा गांधी के लिए चुनावी कार्य शुरू कर दिया था और 13 जनवरी को अपना इस्तीफा दे दिया था, लेकिन वह 25 जनवरी तक सरकारी सेवा में जारी रहे थे। इंदिरा गांधी, निर्णय के अनुसार, 29 दिसंबर, 1970 से खुद को उम्मीदवार के रूप में प्रकट कर रही थीं, जिस दिन उन्होंने नई दिल्ली में एक समाचार सम्मेलन को संबोधित किया और चुनाव के लिए खड़े होने के अपने फैसले की घोषणा की थी। दूसरा आधार यह था कि, उन्होंने उत्तर प्रदेश में सरकारी अधिकारियों से सहायता प्राप्त की ताकि वे चुनावी रैलियों को संबोधित कर सकें। अधिकारियों ने लाउडस्पीकर और बिजली की भी व्यवस्था की थी। न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने उन्हें छह साल के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत कोई भी चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया, लेकिन निर्णय के प्रभाव पर 20 दिनों तक की रोक लगा दी जिससे वो मामले की अपील सुप्रीम कोर्ट में कर सकें (हालाँकि, स्टे के इस फैसले को कुछ विशेषज्ञों द्वारा जस्टिस सिन्हा की चूक के रूप में देखा जाता है)।
        न्यायमूर्ति सिन्हा और मामले से जुड़े कुछ किस्से 

                     न्यायमूर्ति सिन्हा के बारे में बात करते हुए दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर बताते हैं कि इमरजेंसी लगाये जाने के पश्च्यात, न्यायमूर्ति सिन्हा को ''परेशान' करने के सम्बन्ध में निर्देश दिल्ली से इलाहाबाद भेजे गए थे। उनके करियर से संबंधित सभी कागजात की गहनता से जांच की गई थी, उनके परिवार के सदस्यों को परेशान किया गया, और वह हर समय पुलिस की छाया में रहते थे। यह जानना शायद पाठकों के लिए दिलचस्प हो कि इस निर्णय को गुप्त कैसे रखा जाए, यह जस्टिस सिन्हा की सबसे मुख्य चिंता थी। उन्होंने फैसला सुनाने से पहले अपने निजी सचिव, मन्ना लाल को गोपनीयता की शपथ दिलाई थी। उन्होंने निर्णय का प्रभावी हिस्सा (operative part) अपने हाथ से लिखा और अपने स्टेनोग्राफर को छुट्टी पर भेज दिया था। फिर भी, सरकारी खुफिया एजेंसी ने फैसले के बारे में जानने के लिए कई प्रकार के प्रयास किए। यहां तक कि साधुओं का भी इस्तेमाल किया गया था क्योंकि न्यायमूर्ति सिन्हा पर साधुओं का बहुत प्रभाव रहा था। किसी ने नहीं सोचा था कि पी. एन. हकसर के सुझाव पर, फरवरी 1972 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थायी न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति सिन्हा की नियुक्ति को मंजूरी देने वाली प्रधानमंत्री के चुनाव को तीन साल बाद, उसी न्यायाधीश के एक फैसला द्वारा रद्द कर दिया जायेगा। शायद यही जनतंत्र का सार है।

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