सैन्धव कालीन धातु मूर्तियों मधूच्छिष्ठ विधि या लुप्त मोम ;स्वेज ूंगद्ध प्रक्रिया से बनायी गयी है।
मोहनजोदड़ों के भ्त् क्षेत्र से नर्तकी की एक काँस्य मूर्ति (11.5 सेमी) मिली है। जिसे आद्य आस्ट्रेलायड प्रजाति से सम्बन्धित किया जाता है।
सैन्धव कालीन मुहरे अधिकांशतः सेलखड़ी की बनी थी और इनका आकार चैकोर, आयताकार या वर्गाकार होता था। मुद्राओं पर सबसे अधिक एकश्रृंगी पशु चित्रित है लेकिन कला की दृष्टि से सबसे उत्कृष्ट मूर्ति कूबड़ वाले साड़ों की है।
मोहनजोदड़ों से पशुपति शिव की मुहर पा्रप्त हुई है। जिसके दाहिनी ओर एक हाथी और बाघ तथा बायी ओर एक गैंडा और भैंसा खड़े हुए है। चैकी के नीचे दो हिरण चलते हुए प्रतीत होते है। मार्शल ने इसे शिव का आदि रूप कहा। इसे मंगोलायड प्रजाति से जोड़ा जाता है।
सैन्धव लिपि चित्राक्षर (पिक्टोग्राफ) थी। इसमें 410 तक चिह्न प्राप्त हुए है। इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। इसे पढ़ने का प्रयास के0एन0 वर्मा, एस0आर0 राव, आई महादेवन तथा रेवरण्ड हैरस आदि ने किया है।
सैन्धव लिपि दायें से बायी ओर लिखी जाती थी। जब अभिलेख में कई पंक्तियाँ होती थी तो पहली पंक्ति दायीं से बायीं ओर और दूसरी पंक्ति बायीं से दायीं ओर लिखी जाती थी। इसको बूस्ट्रोफेडन (गौमूत्रिका) पद्धति कहा गया है।
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