ताम्रपाषाणिक संस्कृति (प्राचीन भारतीय इतिहास-18)

ताम्रपाषाणिक संस्कृति-

      आहार (द0पू0 राजस्थान) का प्राचीन नाम ताम्बवती है क्योंकि यहाँ से पत्थर की जगह ज्यादातर ताँबे के औजार प्राप्त हुए है।

      कायथा संस्कृति हड़प्पा संस्कृति की कनिष्ठ समकालीन मानी जाती है।

      कायथा के एक घर में ताँबें के 29 कंगन और दो अद्वितीय ढंग की कुल्हाड़ियाँ पायी गयी है।

      मालवा मृदभाण्ड को सभी ताम्रपाषाणिक मृदभाण्डों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

जोर्वे ताम्रपाषाणिक संस्कृति (महाराष्ट्र)

      प्रमुख स्थल-जोर्वे, नेवासा, दैमावाद, अहमदनगर जिले में, चन्दोली, सोनगाँव, इनामगाँव, प्रकाश नासिक पूणे, दैमाबाद से ताँबे की चार प्रमुख वस्तुएँ प्राप्त हुई है। यहाँ से बहुत सारे कलश शवाधन प्राप्त हुए है जो घरों में फर्श के नीचे दफनाएँ गये हैं।

      इनामागाँव से किलाबन्द और खाई से घिरी बस्ती थी। इनामगाँव में शिल्पी पश्चिमी छोर पर एवं सरदार प्रायः केन्द्र स्थल पर रहता था। इससे निवासियों के बीच सामाजिक दूरी जाहिर होती है। नेवासा से पटसन का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। गणेश पूजा का साक्ष्य दैमाबाद से प्राप्त हुआ है।

सैंधव सभ्यता के पतन के कारण

विद्वान

सिन्धु नदी की बाढ़

मार्शल, मैके

वाह्य आक्रमण

गार्डन चाइल्ड एवं मार्टीमर ह्वीलर

जलवायु परिवर्तन

आरेल स्टीन व अमलानन्द घोष

भूतात्त्विक परिवर्तन

राइक्स एवं जार्ज एफ0 डेल्स

प्राचीन स्थल

पुरातत्त्वीय खोज

लोथल

गोदीबाड़ा

कालीबंगा

जोता हुआ खेत

बनावली

मिट्टी का हल

धौलावीरा

सैन्धव लिपि के बड़े आकार के दस चिन्हों वाला एक अभिलेख

-शेष अगले भाग में

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