ऋग्वेद का पहला मंत्र अग्नि की स्तुति से प्रारम्भ होता है। ऋग्वेद के 2 से 7 तक के मण्डल को वंश मण्डल कहा जाता है।
मण्डल ऋषि
द्वितीय ः गृहत्समद
तृतीय ः विश्वामित्र (गायत्री मंत्र का उल्लेख)
चतुर्थ ः बामदेव अंगिरस (कृषि से सम्बन्धित क्रिया)
पंचम ः अत्रि
षष्ठ ः भारद्वाज
सप्तम् ः वशिष्ठ
अष्टम् ः कण्व, भृगु, अंगिरस
नौवा ः कण्व, भृगु, अंगिरस (सोम को समर्पित)
दशम ः त्रित, विमद, श्रद्धा कामायनी
ब्राह्मण ग्रन्थ
ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रन्थ ः ऐतरेय, कौषतीकि
सामवेद ः जैमिनीय, ताण्ड्य
यजुर्वेद ः शतपथ, तैत्तिरीय
अथर्ववेद ः गोपथ ब्राह्मण
शतपथ ब्राह्मण-जल प्लावन कथा, पुनर्जन्म का सिद्धान्त, पुरूरवा उर्वशी आख्यान, रामकथा।
उपनिषद ः
ऋग्वेद ः ऐतरेय, कौषीतकी
सामवेद ः जैमिनीय, छान्दोग्य (उद्दालक आरूणि एवं श्वेतकेतु का बीच संवाद)
यजुर्वेद ः वृहदारण्यक (याज्ञवल्क्य गार्गी संवाद), कठोपनिषद (यम नचिकेता आख्यायन), ईशोपनिषद, श्वेताश्वर, मैत्रायणी
अथर्ववेद ः मुण्डक, माण्डूक्य, प्रश्न मुण्डकोपनिषद-सत्यमेव जयते एवं यज्ञों की टृटी नौकाओं के समान बताया गया।
कठ, मुण्डक, ईश और श्वेताश्वर उपनिषद पद (छन्द) में है।
प्रश्न तथा केन उपनिषद-गद्य और पद्य में है।
शेष सभी उपनिषद गद्य में है।
वेद पुरोहित
ऋग्वेद ः होता (मंत्रों का उच्चारण)
सामवेद ः उदगाता (वैदिक मंत्रों का गायन)
यजुर्वेद ः अध्वर्यु (कर्मकाण्डों को सम्पन्न कराना)
अथर्ववेद ः ब्रह्मा (निरीक्षण कर्ता)
-शेष अगले भाग में