मृत्यु दण्ड में आशा की आखिरी किरणः राष्ट्रपति और राज्यपाल

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राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान शक्तियों के बीच अंतर:

      अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का दायरा अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमादान शक्ति से अधिक व्यापक है जो निम्नलिखित दो तरीकों से भिन्न है: - 

    १. कोर्ट मार्शल: कोर्ट मार्शल के तहत राष्ट्रपति सजा प्राप्त व्यक्ति की सजा माफ़ कर सकता है परंतु अनुच्छेद 161 राज्यपाल को ऐसी कोई शक्ति प्रदान नहीं करता है।

    २. मौत की सजा: राष्ट्रपति उन सभी मामलों में क्षमादान दे सकता है जहाँ दी गई सजा मौत की सजा है लेकिन राज्यपाल की क्षमादान शक्ति मौत की सजा के मामलों तक विस्तारित नहीं होती है।

लेकिन अब ........... 

3 अगस्त, 2021 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने कहा कि राज्य के राज्यपाल (Governor) मौत की सजा के मामलों सहित कैदियों को क्षमा कर सकते हैं। राज्यपाल (Governor) कम से कम 14 साल की जेल की सजा पूरी करने से पहले ही कैदियों (prisoners) को माफ कर सकते हैं। कोर्ट (Court) ने यह भी कहा कि क्षमा करने की राज्यपाल की शक्ति दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433 ए के तहत दिए गए प्रावधान को ओवरराइड करती है।

                            कोर्ट ने कहा, अनुच्छेद 161 के तहत कैदी को क्षमा करने की राज्यपाल (Governor) की संप्रभु शक्ति (sovereign power) का प्रयोग वास्तव में राज्य सरकार (State government) द्वारा किया जाता है, न कि राज्यपाल (Governor) अपने दम पर। भारतीय संविधान (Indian constitution) का अनुच्छेद 161 किसी राज्य के राज्यपाल को कानून के खिलाफ किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी भी व्यक्ति की सजा को माफ करने, राहत देने, राहत देने या सजा देने या निलंबित करने, हटाने या कम करने की शक्ति प्रदान करता है।

धारा 433A के बारे में:

                            धारा (Section) 433 A में कहा गया है कि 14 साल की जेल के बाद ही कैदी की सजा को माफ किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि संहिता की धारा 433-A संविधान के अनुच्छेद 72 या 161 के तहत क्षमादान देने की राष्ट्रपति (President) या राज्यपाल (Governor) की संवैधानिक शक्ति (constitutional power) को प्रभावित नहीं कर सकती है और न ही प्रभावित करती है। ऐसी शक्ति संप्रभु की शक्ति के प्रयोग में है। हालांकि, राज्यपाल को राज्य सरकार की सहायता और सलाह पर कार्य करना होगा।

मृत्यु दण्ड में आशा की आखिरी किरणः राष्ट्रपति और राज्यपाल

               संविधान के अनुच्छेद 72 के मुताबिक राष्ट्रपति और संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार  -

                     राज्यपाल सजा को माफ कर सकते हैं, स्थगित कर सकते हैं, कम कर सकते हैं या उसमें बदलाव कर सकते हैं. हालांकि फांसी की सजा को माफ करने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास ही है. ये फैसला राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर है.

 ‘न्यायिक प्रक्रिया’ में उसके पास कोई विकल्प नहीं बचता. ये बात समझनी महत्वपूर्ण है. यदि राष्ट्रपति ने उसकी सज़ा में ढील दी है तो इसका मतलब ये नहीं कि उसके साथ पिछली अदालतों में न्याय नहीं हुआ था. इसका मतलब तो दरअसल ये है कि उसके साथ उच्चतम न्यायलय ने पूरा न्याय किया था, और सारी बातें सोच समझकर ही उसे फांसी दी गई. ये तो बस राष्ट्रपति या राज्यपाल की ‘दया’ है कि उन्होंने दोषी को माफ़ कर उसकी सज़ा स्थगित कर दी, कम कर दी या उसमें बदलाव कर दिया.

इसे एक उदाहरण से समझें – यदि किसी दोषी को हाई कोर्ट फांसी की सज़ा देता है और सुप्रीम कोर्ट उसे बरी कर देता है तो बरी हुआ शख्स कह सकता है कि वो निर्दोष था. जबकि यदि किसी दोषी को सुप्रीम कोर्ट फांसी की सज़ा देता है और राष्ट्रपति उसकी सज़ा माफ़ कर देते हैं तो वो ये नहीं कह सकता कि वो निर्दोष था. बल्कि उसे ऐसा कहना चाहिए कि वो दोषी था लेकिन राष्ट्रपति ने उसकी सज़ा माफ़ कर दी.

राष्ट्रपति और राज्यपाल को दी गई यह शक्ति या विशेषाधिकार इस अवधारणा पर आधारित है कि राजा किसी भी अपराधी के दंड को क्षमा कर सकता है. चूंकि राजा देश का प्रमुख होता था, अतः यह शक्ति संविधान के द्वारा देश एवं राज्य के प्रमुख क्रमशः राष्ट्रपति एवं राज्यपाल में निहित की गई है.

अब ये जो ‘माफ़ी’ है, राष्ट्रपति अपनी मर्जी से किसी को भी ऐसे ही नहीं दे देते. संविधान में साफ कहा गया है कि राष्ट्रपति मंत्री परिषद से सलाह लेकर ही माफ़ी या छूट दे सकते हैं. दरअसल गृह मंत्रालय राष्ट्रपति को लिखित में अपना पक्ष देता है. इसे ही कैबिनेट का पक्ष मानकर राष्ट्रपति दया याचिका पर फैसला लेते हैं.

दया याचिका देने का जो प्रोटोकॉल है उसके अनुसार ज़रूरी नहीं कि अपराधी ही दया याचिका लिखकर या साइन करके दे. उसके बदले भारत (या विदेश का भी) कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति या गृह मंत्रालय को दया याचिका भेज सकता है. दया याचिका राज्यपाल के द्वारा भी गृह मंत्रालय या राष्ट्रपति को भेजी जा सकती है.

जब तक राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए मृत्युदंड पर विचार कर रहे होते हैं तब तक दोषी का मृत्युदंड स्थगित (पोस्टपॉन) रखा जाता है.

संविधान के अनुसार भी राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति न्यायिक समीक्षा से परे हैं. लेकिन इस पूरी ‘माफ़ी प्रक्रिया’ में चूंकि राष्ट्रपति या राज्यपाल मंत्रिपरिषद के निर्णय के आधार पर फैसला लेते हैं, इसलिए कई बार निर्णय ‘राजनीति से प्रेरित’ भी देखे गए हैं. इसी चक्कर में 2006 में एक केस की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय को यह कहना पड़ा था कि यदि अनुच्छेद 72/161 के अंतर्गत राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों का प्रयोग राजनीतिक फायदे के लिए किया गया है तो उसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है.

राज्यपाल सिर्फ इन मामलों में ही दे सकता है माफी

राष्ट्रपति जहां हर मामले में माफी दे सकता है वहां राज्यपाल की माफी की शक्तियां सीमित हैं.

# जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि राज्यपाल फांसी के मामले में सजा को माफ नहीं कर सकता. इसी तरह से राज्यपाल सेना के कोर्ट में मिली सजा को भी माफ नहीं कर सकता.
# राज्यपाल मृत्यदंड की सजा सिर्फ निलंबित (विराम), दंड अवधि को कम (परिहार) या दंड का स्वरूप बदल (लघुकरण) सकता है. इससे कंफ्यूज न हों. राष्ट्रपति को इसे पूरी तरह से माफ करने का अधिकार है.
# राज्यपाल किसी भी दंड को माफ कर सकता, अस्थायी रूप से उस पर रोक लगा सकता है या सज़ा की अवधि को कम कर सकता है.

तमिलनाडु के 20वें गवर्नर बनवारीलाल पुरोहित हैं. तमिलनाडु सरकार ने राजीव गांधी की हत्या से जुड़े मामले में 7 लोगों की सजा माफी की फाइल इन्हें भेजी है. माफी पर मंजूरी अब भी अटकी है. (फोटो-पीटीआई)

अब जरा इन तकनीकी शब्दों को भी समझ लीजिए

राष्ट्रपति के पास माफी को लेकर कई तरह की शक्तियां होती हैं. इनमें शामिल हैं लघुकरण, परिहार, विराम, प्रतिलंबन और क्षमा. आइए अब इनमें अंतर समझते हैं.

लघुकरण (Commutation) – इसमें सजा की प्रकृति या नेचर को बदल दिया जाता है. मतलब अगर मौत की सजा दी गई है तो उसे बदल कर कठोर कारावास में बदला दिया जाए.

परिहार (Remission) – यह एक तरह से सजा की अवधि को कम करना है. याद रहे इसमें सजा का नेचर नहीं बदला जा रहा है. मान लीजिए किसी को 2 साल के कठोर कारावास की सजा मिली है तो उसे बदल कर 1 साल के कठोर कारावास में बदल दिया जाता है.

विराम (Respite) – किसी खास वजह से सजा को कम कर दिया जाए. मान लीजिए कोई सजा के दौरान अपंग हो गया या किसी महिला कैदी ने बच्चे को जन्म दिया या वह गर्भवती है. ऐसी परिस्थिति में सजा को विराम दिया जा सकता है. मतलब सजा होगी लेकिन कुछ दिन के लिए रोक दी गई है.

प्रविलंबन (Reprieve) – माना कि किसी अपराध के लिए सजा मिली लेकिन दंड को कुछ समय के लिये टाल दिया गया. मिसाल के तौर पर फांसी को कुछ समय के लिए टालना. विराम और प्रविलंबन में यही फर्क है कि विराम के लिए कुछ खास परिस्थितियां चाहिए प्रविलंबन के लिए नहीं.

क्षमा (Pardon) – यह पूरी तरह से माफी है. तकनीकी मतलब यह कि माफी के बाद किसी को भले ही कोर्ट ने सजा दी हो उसे मुजरिम नहीं कहा जा सकता. ऐसा मान लीजिए कि तकनीकी तौर पर अपराध कभी हुआ ही नहीं

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